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महाराज भोज परमार: जिन्होंने महमूद गजनवी को हराया था

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परमार नाम भगवान् विष्णु का पुरातन नाम है। परमारो का उदय म्लेक्षों की बाढ़ का सर्वनाश करने ही हुआ था। बर्बर मुसलमानो ने मालवा के प्रदेशो तक को कुचल कर रख दिया था। लेकिन परमार वीरों ने निरंतर युद्ध लड़ते हुए इन म्लेक्ष आक्रमणकारियों को मार भगाया।

विदेशी शक्ति सिकंदर को भी मालवो से टक्कर लेनी पड़ी थी , अर्थात मालव परमारो से टक्कर लेनी पड़ी थी। शको तथा हूणों को रोकने में भी परमारो का ही योगदान रहा था , अतः विदेशी शत्रु को सबक सिखाने में यह लोग अभ्यस्त थे।

इतिहास के अनुसार प्रतिहारो के पतन और चन्देलो की शक्ति के साथ एक अन्य शक्ति परमारो का भी उदय हुआ। उपेंद्र परमार इसके संस्थापक राजा थे ।

मुहम्मद गजनवी के आक्रमण के बाद हिन्दू राजाओ की क्षत्रिय संघ संगठन परमार राजा भोज द्वारा ही बनाया गया था , जिसके कारण भारतीय सपूतो ने अगले १५० सालो तक इन हिंसक जानवरो को रोके रखा।

महाप्रतापी सुसंस्कृत और कविराज भोज भारत के इतिहास के एक अद्वितीय योद्धा है। जिन्होंने अपने कृपाण की धार से अपने नाम को पुरे विश्व में चमका दिया था। उनके प्रताप से उनकी धारा नगरी का नाम पुरे विश्व में पहचान पाने लग गया। परमार अभिलेखों से हमे ज्ञात होता है , राजा भोज कैलाश से मलय तक , उदयाचल से अस्ताचल तक राजा भोज का साम्राज्य था ,उदयपुर प्र्शस्ति के श्लोक १७ के अनुसार राजा भोज सम्राट पृथु की तरह इस धरती को भोगता था।

उनके शासन से जनता ने उनके ईश्वर के रूप में राजा मान लिया था , अपने पूर्वज वाक्यपति मुंज की तरह ही राजा भोज भी एकमात्र सार्वभौम सम्राट बनने की ठान चुके थे , और उन्होने कलचुरियो को परास्त किया । यह १०३० आसपास की बात है।

कर्नाट पर इस समय तेलप दित्य शाशन कर रहा था , जिसने धोखे से वाक्यपति मुंज की हत्या की थी। गोदावरी नदी पार करने के कारण ही मुंज की मौत हुई थी , इस बार भी दरबारियों ने मना किया , की महाराज आप गोदावरी नदी पार ना करें , गोदावरी नदी के उस पार चालुक्य बहुत शक्तिशाली है।

लेकिन भोज तो किसी भी कीमत पर तेलप का सिर धड़ से अलग करना चाहते थे , शायद भोज स्वम् ही मुंज का अवतार हो , या किसी नाटक कविता क्व द्वारा मुंज का कोई खत , पत्र , पढ़ा हो। महाराज भोज ने पूरी शक्ति के साथ तेलप पर गोदावरी नदी पार करते हुए हमला बोला , यह इतना तेज हमला था , तेलप खुद को संभाल हुई नहीं पाया। भोज ने तेलप को बंदी बनाकर उसके साथ वहीँ व्यव्हार किया , जो व्यवहार उसने वाक्यपति मुंज के साथ तेलप ने किया था।

भोज परमार एक अद्वितीय शासक थे , उनका अधिकांश समय जीवन का युद्ध भूमि पर ही बीता। उन्होंने कई युद्ध हारे भी , और कई राजाओ को अपने सामने झुकाया भी। भोज इतने पराक्रमी थे , की गद्दी पर बैठते ही उन्होंने सबसे पहले अपने चाचा की हत्या का प्रतिशोध लिया था।

राजा भोज के समय ही गजनी का सुल्तान मुहम्मद गजनवी भारत पर चढ़कर आया था , लाखो की संख्या में यह तुर्कमान , तुर्किस्तान , सिंध , अफगानिस्तान, ईरान, इराक , और सभी नए नवेले इस्लामी गुंडों की फौज लेकर वह मध्य भारत पर भी चढ़ आया था ।

कुछ राजपूत शासक उसकी शक्ति , छल के आगे उखड़ गए और कुछ कभी ना झुकने वाले ध्वज की तरह उसके आगे खड़े रहे। उन्ही में से एक थे राजा भोज। वर्तमान भोपाल उन्ही की बसाई हुई नगरी है , इन्ही के नेतृत्व ने राजपूतो ने संगठन बनाया था , और आनंदपाल के लिए सेना मदद को भेजी गयी थी। धार की भोजशाला , महाकालेश्वर मंदिर भी महाराज भोज ही की देंन है।

महमूद गजनवी ने गुजरात को विध्वंस किया था। गुजरात की रक्षा की जिम्मेदारी मूलराज प्रथम चालुक्य को मिली थी। वह इस काम में असफल सिद्ध हुए । अतः गुजरात में सभी राहत साम्रगी पहुंचकर उन्होंने गजनवी से अपनी जनता पर किये अत्याचार का बदला लेने की ठानी। भोज के लिए यह दुःखद था की उन्हें मालवा से गुजरात पहुँचने में ७ दिन लग गए थे।उसके बाद राजा भोज ने सीधे ग़जनवी पर आक्रमण किया। भोज के इस आक्रमण से भयभीत होकर गजनवी को रेगिस्तान में शरण लेनी पड़ी थी।

राजा भोज केवल वीर ही नहीं थे अपितु एक महान विद्वान राजा थे। चालुक्य राजा तेलप और गांगेय सेन को एक साथ परास्त करने के कारण आज भी इतिहास में कहाँ राजा भोज , कहाँ गंगू तेली ” मुहावरा इतिहास में पड़ा हुआ है।

भोज प्रबंधनम नाम से उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी थी। भोज की राजसभा में ५०० से ज़्यादा विद्वान थे , जिसमे नौ रत्न तो प्रमुख थे। उस समय महाराज भोज ने जहाज बनाने की कला तथा स्वचालित यंत्र(रोबोट जैसी) तकनीक पर काम करने की बात करते अपनी आत्मकथा में मिल जाएंगे। नदियों को चैनलाइज करने के लिए भी महाराज भोज को ही याद किया जाता है।

महाराज भोज ने अपनी तलवार की धार से अपनी धारा नगरी को महान बनाया था। आपने अपने धनुष के बल पर पूरी पृथ्वी का भोग किया। महाराज भोज को साहित्यो से इतना लगाव था की वे प्रत्येक कृति के लिए कवि को एक लाख के रूपये का इनाम देते थे , साहित्यो का ऐसा सम्मान उनके दरबार में था।

साहित्यो में रूचि रखने वाले महाराज भोज स्वम् भी बहुत बड़े विद्वान थे , आयुर्वेद सर्वसर्व , समरगण सूत्रधार , राजमुषांक , व्यवहार समुच्चय जैसी कृतियाँ महाराज भोज की ही देंन है।

महाराज भोज ने अपने शाशनकाल में एक झील का निर्माण करवाया था , २५० वर्ग मील के क्षेत्र में यह झील थी , इस्लामी आक्रमण के बाद यह झील रखरखाव के अभाव में सुख गयी। धार के लोह स्तम्भ का निर्माण उन्होंने ही करवाया था।

अपने शाशनकाल के अंतिम समय में उनपर चालुक्य तथा चेदि नरेश का एक साथ हमला हुआ। यह युद्ध भोज परमार हार गए , और उसी दुःख में बीमार पड़ गए, उसके बाद उनकी मृत्यु ही हो गयी।

उनकी मृत्यु पर विद्वानों ने कहा,

असधारा निराधारा निराविलम्ब सरस्वती पंडित खंडिता सर्वभोज राज दिगवते

अर्थात भोजराज के निधन के बाद यह पृथ्वी अनाथ हो गयी है , सरसवती नदी एक बार फिर सुख गयी , सभी पंडित खंडित हो गए।

Maharaja Bhoj

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