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तुलसीदास अमृतवाणी दोहे-अर्थ सहित & English Lyrics-2

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तुलसीदास के दोहे-तुलसीदास अमृतवाणी:( हिन्दी भावार्थ सहित)-2

Tulsidas Ke Dohe: Tulasidas Amritvani – Lyrics with meaning in Hindi

तुलसीदास अमृतवाणी दोहे अर्थ सहित & English Lyrics-1

चातक  तुलसी के मते, स्वातिहु  पिए ना पानि|
प्रेम त्रिशा बढ़ती भली, घटे घटे  की आनी||21||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदासजी के विचार से चातक को स्वाती नक्षत्र के मेघ का जल मिल गया है| लेकिन फिर भी वह जल  नहीं पीना चाहता है, क्योकि पानी पी लेने से प्यास रूपी प्रेम की तीव्रता घटेगी और प्रेम की तीव्रता घटना का उसके मान की हानि है,क्योंकि चातक इसलिए ही जाना जाता है, कि उसे  केवल स्वाती नक्षत्र  के मेघ से अत्यधिक प्रेम है |

रटत रटत रसना लटी, तृषा सूखिगे अंग|
तुलसी चातक  प्रेम का, नित नूतन रूचि रंग||22||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं की चातक हमेशा स्वाती नक्षत्र के मेघ  का रट लगाता रहता है, प्यास से सब अंग सूख गये हैं, फिर भी चातक का प्रेम कभी कम नही होता और वो नित्य नयी रूचि और प्रेम के साथ अपनी पुकार लगाता रहता है |


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चरण चोंच लोचन रंगो, चलो मराली चाल|
क्षीर नीर बिच समय कब , पुनर धरत तेहि काल||23||

हिन्दी भावार्थ:  मनुष्य का असली चरित्र एक दिन सामने आ ही जाता है। बगुला चाहे अपने चरण ,चोंच और आँखों को हंस कि तरह रंग ले और हंस कि सी चाल भी चलने लगे ,परन्तु जिस समय दूध और जल को अलग-अलग करने का अवसर आता है ,उस समय उसकी पोल खुल जाती है। इसी प्रकार कोई बुरा मनुष्य यदि सज्ज्नों कि तरह अपनी वेषभूषा ,अपनी बोलचाल,अपनी चाल-ढाल बना भी ले तब भी समय आने पर उसकी वास्तविकता का पता चल ही जाता है।

होहु कहावत सब कहत , राम सहत उपहास|
साहिब सीतानाथ सो, सेवक तुलसीदास||24||

हिन्दी भावार्थ:  तुलसीदास जी कहते हैं की मेरे परम शक्तिमान श्री राम तो सर्वा समर्थ हैं और ये बड़े ही संकोच की बात है की उन जैसे स्वामी का तुलसीदास जैसा तुच्छ सेवक है| यहा तुलसीदास अपने आप को प्रभु श्री राम के समक्ष एकदम नगण्य करके देख रहे हैं | यह भक्ति की उच्चतम अवस्था है |

जेहि प्रसंग दूषण लगे , तजिए ताको साथ|
मदिरा मानत है जगत, दूध कलासी  हाथ||25||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदास जी कहते हैं की जो वास्तु हानिप्रद है उसका तुरंत त्याग कर देना चाहिए | बुरा काम करनेवाले इन्सान के साथ खडा रहना या कहीं जाना नहीं चाहिए । शराब बेचनेवाले के हाथमें अगर दूध होगा तो भी लोग दूध को शराब ही समझेंगे |

तुलसी या संसार में, तीन वस्तु है सार|
सत्संग, हरी भजन एक , निस दिन पर उपकार||26||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदास जी कहते हैं की इस संसार में तीन चीज़ें ही मुख्य रूप से करने योग्य हैं | पहल सत्संग ( संतो और सज्जनो के के साथ प्रभु चर्चा), प्रभु का गुण गान और उनका हरदम स्मरण और नित्य परोपकार करना |

लहहि ना फूटी कौड़िहू, की चाहे केहि काज|
सो तुलसी महंगो कियो, राम ग़रीब निवाज़ ||27||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदास  स्वयं के बारे में कहते हैं कि जिस तुलसीदास को पहले फूटी कौड़ी भी नही मिलती थी |उसी तुलसी का महत्व और समाज में स्थान  श्री रामजी की कृपा से बहुत बढ़ गया है|

सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन ।
ते पै तिन्ह के जाहिं भर , जिन्ह के हिएँ न नैन||28||

हिन्दी भावार्थ: जो कभी भी याद नही करते और मिलने पर प्रिय वचन भी नही बोलते, उनको पातिन्ह के के समान त्याज्य जानकर  छोड़ देना चाहिए  क्योंकि उनका हृदय प्रेम को नही समझ सकता|

कामिही नारी पियारि जिमी, लोभिहि प्रिय जिमी दाम|
तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहू मोहि राम||29||

हिन्दी भावार्थ: जिस प्रकार से कामातुर व्यक्ति को स्त्री प्रिय होती है और लालची व्यक्ति को धन, उसी प्रकार या उससे भी बढ़कर तुलसीदासजी तो प्रभु श्री राम जी से प्रेम हैं | उनका प्रभु से प्रेम संसार की हर वस्तु से बढ़कर है|

घर कीन्हे  घर जात है, घर छोड़े घर जाई|
तुलसी घर वन बीच ही, राम प्रेम पुरछाइ ||30||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदास जी इस पद में जीव के उस परम स्थाई घर की बात कर रहे हैं जिससे जीव आया है. ओर निर्वाण रूपी घर , घर में चिपक कर रहने से नही मिलेगा और उस घर का लक्ष्य छोड़ देने पर भी नही मिलेगा | उस निर्वाण रूपी घर को पाने का उपाय यही है कि घर और वन के बीच में राम प्रेम की पूरच्छाई बना ली जाय और उसी का सेवन किया जाय |अर्थात राम प्रेम में निरंतर डूबे रहने पर अवश्य ही निर्वाण रूपी घर मिलेगा|

श्रोता, वक्ता, ज्ञान निधि, कथा राम के ग़ूढ|
किमि  समझौं मैं जीव जड़, कलिमल ग्रसित विमूढ़||31||

हिन्दी भावार्थ: रामायण को सुनने वाले , और कथा सुनाने वाले ज्ञान के सागर होते हैं | उनको मैं कलियुग के बुराइयों से ग्रसित मनुष्य भला किस प्रकार समझ सकता हूँ |

राम कथा मंदाकिनी, चित्रकूट चितचारू|
तुलसी सुभग सनेह वन, सिय रघुबीर विहारू||32||

हिन्दी भावार्थ:श्री राम जी की कथा पवित्र  मंदाकिनी नदी है | निर्मल चित्त (मन) ही चित्रकूट है और सुंदर स्नेह ही वन है जिसमे श्री रामजी और सीता माता विहार करते हैं|

सकल कामना हीन वे, राम भगति रस लीन|
सदा चरण यो रत रहे, तुलसी ज्यों जल मीन||33||

हिन्दी भावार्थ: जो लोग श्री रामजी की भक्ति में लीन रहते हैं उनकी सारी भौतिक इच्छायें समाप्त हो जाती हैं | वो श्री राम जी के चरणो केध्यान में इस तरह डूबे रहते हैं, जैसे जल में मछली. श्री राम जी के चरणो  के ध्यान को छोड़ कर क्षण भर भी रहना उन्हे स्वीकार नही है|

रामचरित राकेस कर, सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित, हित बिसेषि बड़ लाहु||34||

हिन्दी भावार्थ:: श्री रामजी का चरित्र पूर्णिमा के चाँद के समान सबको सुख और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है| लेकिन सज्जन रूपी कमाल और चकोर के मन को विशेष प्रसन्नता देने वाली है|

सेए सीताराम नही, भजे ना शंकर गौरी|
जनम गँवायो व्यर्थ ही, अरत पराई पौरी||35||

हिन्दी भावार्थ: जिसने सीता राम की सेवा(पूजा, भक्ति , भजन ) नही की या शंकर पार्वती का भजन नही किया, उन्होंने किसी दूसरे द्वार पर माथा टेककर इस जन्म को व्यर्थ ही गंवा दिया|

मज्जहिं सज्जन वृंद बहु ,  पावन सरजू नीर|
जपहि राम धरि ध्यान उर, सुंदर श्याम शरीर||36||

हिन्दी भावार्थ:तुलसीदासजी कहते हैं की पवित्र सरयू नदी के किनारे भले लोगों का बहुत बड़ा समूह स्नान करताहैं. वो श्री राम जी के सुंदर श्याम रूप का का हृदय में ध्यान  करते हैं|

रामनाम का अंक है, सब साधन है सून|
अंक गये कुछ  हाथ नही, अंक रहे दस गून||37||

हिन्दी भावार्थ: श्री राम जी के नाम बिना सारे साधन (जप, ताप, वैराग्य आदि) शून्य के समान हैं |  श्री राम जी का नाम आँक के समान है | जैसे अंक शून्य के पहले लगा देने पर दस गुना हो जताता है, उसी प्रकार, जप, तप , वैराग्य आदि दस गुना फल देंगे, अगर श्री रामजी का नाम साथ में लिया जाय तो|

तुलसी देव  देवालय  को, लागे लाख करोर|
काट अभागी हिय भरो, महिमा भई की थोर||38||

हिन्दी भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं की देवताओं के मंदिर बनवाने में लाखों करोड़ों रुपये लगते हैं उसमे अगर कौवे के बीट कर देने से उसकी महत्व कहीं कम नही होता|

समन अमित उतपात सब, भरत चरित जप जाग|
कलि अघ फल अवगुण कथन, ते जल मल बग काग||39||

हिन्दी भावार्थ: संपूर्ण अनगिनत उत्पातों को शांत करने वाला भरतजी का चरित्र नदी तट पर किया जाने वाला जपयज्ञ है। कलियुग के पापों और दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं, वे ही इस नदी के जल का कीचड़ और बगुले-कौए हैं ।

प्रभु  सनमुख भए नीच नर निपट होत विकराल|
रबि रुख लखि दरपन फटिक,  उगिलत ज्वालाजाल ||40||

हिन्दी भावार्थ:  जिस प्रकार सूर्य का रुख अपनी ओर देखकर दर्पण और स्फटिक आग की लपटें उगलने लगते हैं. प्रभु के सामने आते ही नीच व्यक्ति और आग बबूला हो जाते हैं |

तुलसीदास अमृतवाणी दोहे अर्थ सहित & English Lyrics-3

Tulasidas Amritvani dohe – Lyrics in English

Chatak Tulasi ke mate, Swaatihu piye na paani|
Prem trisha badhati bhali, Ghatai ghatai ki aani||21||

Ratat ratat rasana lage, Trishna sookh ke ang|
Tulasi chatak prem ka, Nit nootan ruchi rang||22||

Charan chonch lochan rango, Chalo maraali chal|
Ksheer neer bich samay kab , Punar dharat tehi kaal||23||

Hohun kahaawat sab kahat, Ram sahat uphaas|
Sahib Sitanaath so, Sevak Tulasidas||24||

Jehi prasang dooshan lage , Tajiye taako saath|
Madira manat hai jagat, Doodh kalaasi haath||25||

Tulasi ya sansaar mein, Teen vastu hai saar|
Satsang, Hari Bhajan ek , Nish din par upkar||26||

Lahahi na footi kaudihu, Ki chahe kehi kaaj|
So Tulasi mahango kiyo, Ram garibaniwaj||27||

Sonaje sumirani karahi, Mili na kahahe priy vain|
Te paitinh ki jahi bhar , Jinhahi hiye nahi nain||28||

Kaamihi nari piyari jimi, Lobhihi priy jimi daam|
Timi Raghunaath nirantar, Priy laagahu mohi Ram||29||

Dharati ne ghar jaat hai, Ghar chhode ghar jaai|
Tulasi ghar van beech hi, Ram prem purchhaain||30||

Shrota, vakta, gyan nidhi, Katha Raam ke goodh|
Kimi samajhaun main jeev jad, Kalimal grasit vimoodh||31||

Ram katha mandakini, Chitrakoot chitachaaru|
Tulasi subhag saneh van, Siy Raghbeer vihaaru||32||

Sakal Kamana heen ve, Ram bhagati ras leen|
Sada charan yo rat rahe, Tulasi jyon jal meen||33||

Ram charit rakesh kar, Sarsi sukhad sab kaahu|
Sajjan kum bich kor chit, Hit visheshi badh laahu||34||

Seye SitaRam nahi, Bhaje na Shankar Gauri|
Janam gavaanyo vyarth hi, Arath paraayi pauri||35||

Majjahin sajjan vrind bahu, Pavan Saraju neer|
Japahi Ram dhari dhyan ur, Sundar shyam shareer||36||

Ramnaam ka ank hai, Sab sadhan hai soon|
Ank gaye kuchh haath nahi, Ank rahe das goon||37||

Tulasi dev devalay ko, Laage lakh karor|
Kaat abhagi hiy bharo, Mahima bhai ki thor||38||

Shaman amit utpat sab, Bharat charit jap jaag|
Kali agh fal avgun kathan, Te jal mal bag kaag||39||

Prabhu sanmukh bhaye neech nar, Nipat hot vikaraal|
Raav rukh lakhi darshan fatit, Ugalit jwala jaal||40||

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