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तुलसीदास अमृतवाणी दोहे-अर्थ सहित & English Lyrics-3

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तुलसीदास के दोहे-तुलसीदास अमृतवाणी:( हिन्दी भावार्थ सहित)-3

Tulsidas Ke Dohe: Tulasidas Amritvani – Lyrics with meaning in Hindi

तुलसीदास अमृतवाणी दोहे अर्थ सहित & English Lyrics-2

मो सम दीन  ना दीनहित, तुम समान रघुबीर।
अस विचारि रघुबंश मणि , हरहू विषम भवभीर ।41।

अर्थ : हे प्रभु श्रीराम, मेरे जैसा कोई ग़रीब दुखी नही प्रभु और आप सा कोई ग़रीबों का भला चाहने वाला नही। यही जानकर हे रघुवंश के सिरमौर भगवान(भगवान राम) मेरे भव चक्र (जन्म-मरण का चक्कर) की पीड़ा हर लीजिए दीनानाथ।

तुलसी जानो सुनो समुझ , कृपा सिंधु रघुनाथ।
महँगे मनि कंचन किए,  सौघो जग जल नाज ।42।

अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं कि उन्होने सुनकर और स्वयं से समझ कर ये जान लिया है की श्री रघुनाथ कृपा सिंधु हैं। उन्होने सहज कृपा करके ही मणि और सोने को महँगा किया और जल अन्न को सहज और सुलभ बनाया है।

ब्रह्म निरूपण धरम विधि, बरनहि तत्व विभाग।
कहहि भगती भगवंत के, संजुत ज्ञान विराग।43।

अर्थ : तुलसीदासजी प्रयाग तीर्थ के बारे में कहते हैं की वहाँ ऋषि मुनि प्रयाग संगम में स्नान करने के बाद भारद्वाज ऋषि के आश्रम में जुटते हैं और वहाँ ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान और तत्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान वैराग्य से युक्त होकर भगवान की भक्ति का वर्णन करते हैं।

वचन वेश के सो बने , सो बिगरै परिणाम।
तुलसी मनपे जो बने, बनी बनाई राम ।44।

अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं की छल- कपट भारी वेश और बातों से जो बात बनती है ,वही बात खुल जाने पर बहुत जल्दी बिगड़ भी जाती है। लेकिन जो कार्य स्वाभाविक रूप से बनते है, वो श्री राम जी की कृपा से बनते ही चले जाता है।

मातु-पिता ,गुरु,स्वामी सिख , सिर धरि करहि सुभाय|
ल़हेऊ लाभ तही जनम कर, ना करू जनम जग जाए||45||

अर्थ:जो लोग माता पिता गुरु और स्वामी की शिक्षा स्वाभाविक ही सिर नवाकर मान लेते हैं, उन्ही का जीवन सफल है, नही तो जन्म व्यर्थ ही गया।

विरुधि परखिए सुजन जन, राखि परखिऐ मंद ।
बड़वानल सोषत उदधि, हरष बढ़ावत चंद ||46||

अर्थ : सज्जन जन अपने व्यवहार से तुरंत ही पहचाने जाते हैं और तुरंत  ही लाभ प्रदान करते हैं । लेकिन दुष्टजन अपना प्रभाव देर में दिखाते है| जैसे बड़वानल तो समुद्र का धीरे-धीरे कुछ जल सुखाता है, लेकिन चंद्रमा तुरंत ही समुद्र को बढ़ा देता है।

राम काम तरु परहित , सेवत काल आरू ठूंठ|
स्वारथ परमारथ चहत, सकल मनोरथ झूठ||47||

अर्थ : जो व्यक्ति प्रभु राम रूपी कल्पवृक्ष से विमुख होकर ढूंठ वृक्ष रूपी कलियुग का गुणगान करता है अर्थात् पाप कर्म करता हुआ उससे स्वार्थ व मोक्ष की इच्छा रखता है, उसकी कामना कभी पूरी नहीं होती। उसे न तो मोक्ष मिलता है और ना ही संसारिक सुख।

पुण्य,प्रीति,पति, प्रस्पतिउं , परमारथ पथ पाँच|
लहहि सुजन परिहरि खलु , सुनहु सिखवान सांच||48||

अर्थ : पुण्य, प्रेम, प्रतिष्ठा, प्राप्ति(लौकिक) और परमार्थ के पाठ को सज्जन लोग ग्रहण करते है लेकिन  दुष्ट लोग इन पाँचों को ही त्याग देते हैं।इस सच्ची सीख को सब सुन और समझ लें।

शरणागत कहूँ जे तजहि , निज अनहित अनुमान|
ते नर पामार पापमय, तिनहि विलोकत हानि||49||

अर्थ : जो अपने शरण में आए हुए व्यक्ति को अपनी हानि होने का अनुमान करके छोड़ देता है| वो लोग महान पाप के भागी होते हैं| उनका मुख देखने से भी पाप लगता है|

तुलसी अद्भुत देवता ,आसा देवी नाम|
सेएँ सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम||50||

अर्थ : तुलसीदास कहते हैं कि ‘आशा’ एक ऐसी अद्भुत देवी है जिसकी सेवा करने से शोक और इससे विमुख होने पर सुख प्राप्त होता है।आशायें ही मनुष्य को तरह तरह के बंधनो में जकड़े रहती हैं इसलिए , निस्पृह होकर हरिनाम का जप करना चाहिए|

अंक अगुन आखर सगुन,समुझिए उभय प्रकार|
खेाएँ राखें आपु भल, तुलसी चारू बिचार||51||

अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म ( १, २, ३ ) अंक के समान है और सगुण भगवान् अक्षर के समान |तुलसी कहते हैं कि ब्रहा अंक के समान गुढार्थ और सगुण ब्रह्म ईश्वर अक्षरों के समान सरलार्थ बताने वाला है , दोनों ही एक ब्रह्म के दो रूप है |अंक जो अक्षर के रूप में लिख देने पर किसी प्रकार का संशय नही रह जाता|..तुलसीदासजी के अनुसार निर्गुण की अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है|

सीता लखन समेत प्रभु, सोहत तुलसीदास|
हरषत  सुर बरसत सुमन, सगुन सुमंगल वास||52||

अर्थ :श्री राम चंद्रजी माता सीता और लक्ष्मण जी सहित शोभायमान हो रहे हैं. उनको देखकर देवता हर्षित हो कर फूल बरसा रहे हैं | जहाँ प्रभु हैं वहाँ सभी सुमंगल भी बसते हैं|

चित्रकूट सब दिन बसत, प्रभु सिय लखन समेत|
राम नाम जप जापकहि, तुलसी अभिमत देत||53||

अर्थ : चित्रकूट ही वह पावन धाम है जहाँ आज भी श्री राम , सीता और लक्ष्मण के साथ सदा सर्वदा मौजूद रह कर अपने भक्तों का कल्याण करते हैं |तुलसीदास कहते है की वह रामप्रभु रामनाम का जप करनेवाले को इच्छित फल देते है|

पय आहार खाई जपु, राम नाम षट मास|
सकल सुमंगल सिद्ध सब, करतल तुलसीदास||54||

अर्थ सिर्फ़ दूध पीकर श्री रामजी का नाम छह (6) महीने जपने से सभी सुमंगल और सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं| ऐसा श्री राम जी के नाम का प्रताप है|

रामनाम अवलंब बिनु , परमारथ की आस|
बरसत वारिद बूँद गहि , चाहत चढ़न अकाश ||55||

अर्थ :श्री राम जी के नाम के आसरे के बिना यदि कोई परलोक में कल्याण चाहता है तो यह उसी प्रकार से व्यर्थ है जैसे कोई बारिश के पानी को पकड़ के आकाश में चढ़ना चाहे|

बिगरी जनम अनेक की, सुधरै अबही आजू|
होहि राम को नाम जप, तुलसी तजिको समाज||56||

अर्थ : तुलसी दासजी कहते हैं की जन्म -जन्म की बिगड़ी को सुधारने का समय अब आ गया है , सब समाज की चिंता छोड़ करके अब श्री रामजी का ही नाम जपना है|

संत सरल  चित जगत हित, जानी सुभाउ सनेहु|
बाल विनय सुन करि कृपा, राम चरण रति देहु||57||

अर्थ : संतों का सरल हृदय होता है और उनका स्वभाव स्नेहपूर्ण होता है| उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझ बालक की विनती सुन कृपा  करके  श्रीरामजी के चरणों में प्रीति दें |

राम नाम पर नाम तें, प्रीति प्रतीति भरोस|
सो तुलसी सुमिरत सकल, सगुन सुमंगल कोस ||58||

अर्थ : प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जो रामनाम के अधीन है और रामनाम में ही जिसका प्रेम और विश्वास है, रामनाम का स्मरण करते ही वह सभी सद्गुणों और श्रेष्ठ मंगलों का खजाना बन जाता है|

जथा सुअंजन अंज दृग, साधक सिद्ध सुजान|
कौतुक देखत शैल वन, भूतल भूरि निधान||59||

अर्थ :जैसे सिद्ध काजल लगा करके के सिद्ध योगी दूर की चीज़ें भी देख लेते हैं | वैसे ही प्रभु भूमि, जंगल और पर्वत में होने वाले सभी कर्मो को देख लेते हैं|

रसना सांपिन वदन बिल, जे जपहि हरिनाम|
तुलसी प्रेम ना राम सो , ताही विधाता वाम||60||

अर्थ :जो लोग हरिनाम को नही जपते उनकी जीभ साँप के समान और मुख सर्प के बिल के समान है| जिसे श्री राम से प्रेम नही उससे तो विधाता ही रुष्ट हैं|

तुलसीदास अमृतवाणी दोहे अर्थ सहित & English Lyrics-4

Tulasidas Amritvani dohe – Lyrics in English

Mosam deen na deen hit, Tum samaan Raghubir|
As bichari Rahubansamani, Harahu visham bhavbheer||41||

Tulasi jaano suno samujh, Kripa Sindhu Raghunath|
Mahangi mani kanchan kiye, Seedhe jag jagnaath||42||

Brahm nirupan dharam vidhi, Baranahi tatv vibhag|
Kahahi bhagati Bhgawant ke, Sanjut gyan virag||43||

Vachan vesh ke so bane , So bigarai parinaam|
Tulasi manape jo bane, Bani banayi Raam||44||

Matu-Pita,Guru,Swami seekh, Sir dhari karahi subhay|
Laheu labh tehi janam kar, Na karu janam jag jaaye||45||

Viruchi prakhiye sujan jan, Raakh parakhiye mand|
Badawanal shoshat udadhi, Harat badhawat chand||46||

Ram kaam taru par hit, Sevat kaal aru thoonth|
Swarath paramarath chahat, Sakal manorath jhooth||47||

Punya,preeti,pati, praspatiyun, Paramarath path paanch|
Lahahi sujan parahari khalu , Sunahu sikhavan saanch||48||

Sharanagat kahun je tajahi, Nij anhit anumaan|
Te nar pamar papmay, Tinahi vilokat hani||49||

Tulasi adbhut devata, Asha devananam|
Seyen shok samarpai, Vimukh bhaye Harinaam||50||

Ank agun aakhar sagun,Samujhiye ubhya praakar|
Khaye Raakhe aap khal, Tulasi chaaru bigar||51||

Sita Lakhan samet Prabhu, Sohat Tulasidas|
Harashat sur barasat Suman, Sagun sumangal vaas||52||

Chitrakoot sab din basat, Prabhu Siy Lakhan samet|
Ram naam jap jaap kahiy, Tulasi aamit dev||53||

Pay ahar khaai japu, Ram naam shat mas|
Sakal sumngal siddh sab, karatan Tulasidas||54||

Ramnaam avalamb binu, Paramarath ki aaas|
Barashat varid boond gahi, Chahata chadhan akash||55||

Bigari janam anek ki, Sudharahei abahi aaju|
Hohi Ram ko naam jap, Tulasi tajiko samaj||56||

Sant sharanchit jagat hit, Jaani subhau sanehu|
Baal vinay sun kari kripa, Ram charan rati dehu||57||

Ram naam par nam te, Preet preetam bharos|
So Tulasi suvarat sakal, Sagun sumngal kosh||58||

Jatha suanjan anj drig, Sadhak siddh sujan|
Kautuk dekhat shail van, Bhutal bhuri nidhan||59||

Rasana saanpin vadan bil, Je japahin Harinaam|
Tulasi prem na rom so , Taahi vidhata vaam||60||

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