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अनुभव पर कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe on Experience

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कबीर की रामानंद द्वारा गुरु दीक्षा (Kabir Das ke Guru)

कबीर के दौर में काशी में रामानंद प्रसिद्ध पंडित और विद्वान व्यक्ति थे, कबीर ने कई बार रामानंद से मिलने और उन्हें अपना शिष्य बनाने की विनती कि लेकिन रामानंद सभी हिन्दू जाति वालों को शिष्य बनाते थे परन्तु शायद इनके मुसलमान जुलाहा होने के कारण उन्होंने इन्हे कुछ समय इनकी परीक्षा ली और इन्हे अपने शिष्य बनाने से बचते रहे। इसलिए हर बार उन्हें आश्रम से भगा दिया जाता था।

एक दिन कबीर ने गुरु रामानंद से मिलने की तरकीब लगायी। रामानंद रोज सुबह जल्दी 4 बजे गंगा स्नान करने घाट पर जाया करते थे, एक दिन कबीर उनके रास्ते में लेट गये। जैसे ही रामानंद उस रास्ते से निकले उनका पैर कबीर पर पड़ा।

बालक कबीर को देखकर अचानक से उनके मुंह से निकल पड़ा “राम-राम”, अपने गुरु रामानंद को प्रत्यक्ष देखकर कबीर बेहद खुश हुए और कबीर को राम-राम नाम का गुरु मन्त्र मिल गया। रामानंद कबीर की श्रद्धा को देखकर अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव
आतम द्रिष्टि कहां लिखै , जित देखो तित पीव।


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Kagat likhai so kagdi,ko vyabhari jeev
Aatam drishti kahan likhai,jit dekho tit peev

भावार्थ: कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है। वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है। आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखते है अपने प्यारे परमात्मा को ही पाते हैं।

Meaning: Whats written on paper is only a document, it is not a pratical experience Inner feeling or view is no where written wherever I see i find my loving God.

कहा सिखापना देत हो, समुझि देख मन माहि
सबै हरफ है द्वात मह, द्वात ना हरफन माहि।

Kaha sikhapna det ho,samujhi dekh man mahi
Sabai haraf hai dwat mah,dwat na harfan mahi.

भावार्थ : मैं कितनी शिक्षा देता रहूॅ। स्वयं अपने मन में समझों। सभी अक्षर दावात में है पर दावात अक्षर में नहीं है। यह संसार परमात्मा में स्थित है पर परमात्मा इस सृष्टि से भी बाहर तक असीम है।

Meaning: How much I teach you, you understand your mind All the letters are in the ink pot but the ink pot is not in the letters.

ज्ञान भक्ति वैराग्य सुख पीव ब्रह्म लौ ध़ाये
आतम अनुभव सेज सुख, तहन ना दूजा जाये।

Gyan bhakti vairagya sukh peev Brahma law dhaye
Aatam anubhav sej sukh,tahan na dooja jaye.

भावार्थ : ज्ञान,भक्ति,वैराग्य का सुख जल्दी से तेज गति से भगवान तक पहुॅंचाता है। पर आत्मानुभव आत्मा और परमात्मा का मेल कराता है। जहाॅं अन्य कोई प्रवेश नहीं कर सकता है।

Meaning: The happiness of knowledge,devotion and renunciation,takes one near to the God.
But the inner experience makes possible meeting with God where none other can go.

ताको लक्षण को कहै, जाको अनुभव ज्ञान
साध असाध ना देखिये, क्यों करि करुन बखान।

Tako lakshan ko kahai,jako anubhav gyan
Sadh Asadh na dekhiye,kyon kari karun bakhan.

भावार्थ : जिसे अनुभव का ज्ञान है उसके लक्षणों के बारे में क्या कहा जाय। वह साधु असाधु में भेद नहीं देखता है।
वह समदर्शी होता है। अतः उसका वर्णन क्या किया जाय।

Meaning: How can I say the features of Him whose experience is the knowledge He doesn’t differentiate as saint or wicked, how then can he be described.


दूजा हैं तो बोलिये, दूजा झगड़ा सोहि
दो अंधों के नाच मे, का पै काको मोहि।

Dooja hain to boliye,dooja jhagra sohi
Do andhon ke nach me ka pai kako mohi.

भावार्थ: यदि परमात्मा अलग अलग हों तो कुछ कहाॅ जाय। यही तो सभी झगड़ों की जड़ है। दो अंधों के नाच में कौन अंधा किस अंस अंधे पर मुग्ध या प्रसन्न होगा?

Meaning: If there are different Gods,then it can be said,this is root of all quarrels. In the dance of two blinds, who will get lured or attracted to whom.


नर नारी के सूख को, खांसि नहि पहिचान
त्यों ज्ञानि के सूख को, अज्ञानी नहि जान।

Nar Nari ke sookh ko,khansi nahi pahichan
Tyon gyani ke sookh ko,aagani nahi jan.

भावार्थ: स्त्री पुरुष के मिलन के सुख को नपुंसक नहीं समझ सकता है। इसी तरह ज्ञानी का सुख एक मूर्ख अज्ञानी नहीं जान सकता है।

Meaning: The pleasure of man and women, an enunch can never understand . So the pleasure of knowledge, a foolish can never know.


निरजानी सो कहिये का, कहत कबीर लजाय
अंधे आगे नाचते, कला अकारथ जाये।

Nirjani so kahiye ka,kahat Kabir lajay
Andhey aage nachte,kala akarath jaye.

भावार्थ: अज्ञानी नासमझ से क्या कहा जाये। कबीर को कहते लाज लग रही है। अंधे के सामने नाच दिखाने से उसकी कला भी व्यर्थ हो जाती है। अज्ञानी के समक्ष आत्मा परमात्मा की बात करना व्यर्थ है

Meaning: What should be said of an unknown, Kabir is shy in saying Dancing before a blind, the art also becomes useless.

ज्ञानी युक्ति सुनाईया, को सुनि करै विचार
सूरदास की स्त्री, का पर करै सिंगार।

Gyani yukti sunaiya,ko suni karai vichar
Surdas ki istri,ka par kare singar.

भावार्थ: एक ज्ञानी व्यक्ति जो परामर्श तरीका बतावें उस पर सुन कर विचार करना चाहिये। परंतु एक अंधे व्यक्ति की पत्नी किस के लिये सज धज श्रंृगार करेगी।

Meaning: One should contemplate over what is said by a knowledgable. For whom would the wife of a blind decorate herself.

बूझ सरीखी बात हैं, कहाॅ सरीखी नाहि
जेते ज्ञानी देखिये, तेते संसै माहि।

Boojh sarikhi bat hain,kahan sarikhi nahi
Jete gyani dekhiye tete sansai mahi.

भावार्थ : परमांत्मा की बातें समझने की चीज है। यह कहने के लायक नहीं है। जितने बुद्धिमान ज्ञानी हैं वे सभी अत्यंत भ्रम में है।

Meaning: This is the matter of understanding, not about saying , As many wise you see, they are all under grave doubts.

लिखा लिखि की है नाहि, देखा देखी बात
दुलहा दुलहिन मिलि गये, फीकी परी बरात।

Likha likhi ki hai nahi,dekha dekhi baat
Dulha dulhin mili gaye,phiki pari barat.

भावार्थ: परमात्मा के अनुभव की बातें लिखने से नहीं चलेगा। यह देखने और अनुभव करने की बात है। जब दुल्हा और दुल्हिन मिल गये तो बारात में कोई आकर्षण नहीं रह जाता है।

Meaning: This is not a matter for writing, this is for seeing and experiencing Once the groom and bride have met, the marriage procession became dull.

भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक
जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक।

Bhitar to bheda nahi,bahir kathai anek
Jo payi bhitar lakhi parai,bhitar bhahir ek.

भावार्थ: हृदय में परमात्मा एक हैलेकिन बाहर लोग अनेक कहते है। यदि हृदय के अंदर परमात्मा का दर्शण को जाये तो वे बाहर भीतर सब जगह एक ही हो जाते है।

Meaning: There is no difference inside, there are many outside If you see him from inside, it is one from inside and outside.

भरा होये तो रीतै, रीता होये भराय
रीता भरा ना पाइये, अनुभव सोयी कहाय।

Bhara hoye to reetai,reeta hoye bhray
Reeta bhara na paiye,anubhav soyee kahay.

भावार्थ: एक धनी निर्धन और निर्धन धनी हो सकता है। परंतु परमात्मा का निवास होने पर वह कभी पूर्ण भरा या खाली
नहीं रहता। अनुभव यही कहता है। परमात्मा से पुर्ण हृदय कभी खाली नहीं-हमेशा पुर्ण ही रहता है।

Meaning: Full may become empty and empty becomes full. There is niether full nor empty, experience says that.

ज्ञानी तो निर्भय भया, मानै नहीं संक
इन्द्रिन केरे बसि परा, भुगते नरक निशंक।

Gyani to nirbhay bhaya,manai nahi sank
Indrin kere basi para,bhugte narak nishank

भावार्थ: ज्ञानी हमेशा निर्भय रहता है। कारण उसके मन में प्रभु के लिये कोई शंका नहीं होता। लेकिन यदि वह इंद्रियों के वश में पड़ कर बिषय भोग में पर जाता है तो उसे निश्चय ही नरक भोगना पड़ता है।

Meaning: A wise is always fearless,he is never in doubt If he comes under the control of sensual desires,he will go to hell without doubt.


आतम अनुभव जब भयो, तब नहि हर्श विशाद
चितरा दीप सम ह्बै रहै, तजि करि बाद-विवाद।

Aatam anubhav jab bhayo,tab nhi harsh Vishad
Chitra deep sam habai rahai,taji kari bad-Vivad.

भावार्थ: जब हृदय में परमात्मा की अनुभुति होती है तो सारे सुख दुख का भेद मिट जाता है। वह किसी चित्र के दीपक की लौ की तरह स्थिर हो जाती है और उसके सारे मतांतर समाप्त हो जाते है।

Meaning: When one experiences in heart, there is no pleasure or pain He becomes constant like lamp in a picture, there is then no debate or discussion.

आतम अनुभव सुख की, जो कोई पुछै बात
कई जो कोई जानयी कोई अपनो की गात।

Aatam anubhav sukh ki,jo koi puchaai bat
Kai jo koyee janayee kai apno ki gat.

भावार्थ: परमात्मा के संबंध में आत्मा के अनुभव को किसी के पूछने पर बतलाना संभव नहीं है। यह तो स्वयं के प्रयत्न,ध्यान,साधना और पुण्य कर्मों के द्वारा ही जाना जा सकता है।

Meaning: If one asks about the experiences of heart,it cannot be explained It can be known through ones own efforts and deeds.

अंधे मिलि हाथी छुवा, अपने अपने ज्ञान
अपनी अपनी सब कहै, किस को दीजय कान।

Andhe mili hathi chhuwa,aapne aapne gyan
Apni apni sab kahai,kis ko deejay kaan

भावार्थ : अनेक अंधों ने हाथी को छू कर देखा और अपने अपने अनुभव का बखान किया। सब अपनी अपनी बातें कहने लगें-अब किसकी बात का विश्वास किया जाये।

Meaning: Many blinds touched the elephant explained as per their sense Everyone told his own, whom should we then believe.

आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पुछै बात
सो गूंगा गुड़ खाये के, कहे कौन मुुख स्वाद।

Aatam anubhav gyan ki jo koye puchhai bat
So gunga gur khaye ke,kahe kaun mukh swad

भावार्थ: परमात्मा के ज्ञान का आत्मा में अनुभव के बारे में यदि कोई पूछता है तो इसे बतलाना कठिन है। एक गूंगा आदमी गुड़ खांडसारी खाने के बाद उसके स्वाद को कैसे बता सकता है।

Meaning: Knowledge of self experience can not be explained if one asks about it If a dumb eats the molasses,how can he explain its taste.

ज्यों गूंगा के सैन को, गूंगा ही पहिचान
त्यों ज्ञानी के सुख को, ज्ञानी हबै सो जान।

Jyon gunga ke sain ko gunga hi pachichan
Tyon gyani ke sukh ko gyani habai so jan

भावार्थ: गूंगे लोगों के इशारे को एक गूंगा ही समझ सकता है। इसी तरह एक आत्म ज्ञानी के आनंद को एक आत्म ज्ञानी ही जान सकता है।

Meaning: The signs of a dumb can be understood by a dumb only. Likewise the pleasure of a knowlegible can be known by a wise only.

ज्ञानी मूल गंवायीयाॅ आप भये करता
ताते संसारी भला, सदा रहत डरता।

Gyani mool gawanyiya aap bhaye karta
Tate sanasari bhala,sada rahta darta

भावार्थ: किताबी ज्ञान वाला व्यक्ति परमात्मा के मूल स्वरुप को नहीं जान पाता है। वह ज्ञान के दंभ में स्वयं को ही कर्ता भगवान समझने लगता है। उससे तो एक सांसारिक व्यक्ति अच्छा है जो कम से कम भगवान से डरता तो है।

Meaning: Man of bookish language looses all basics, becomes God(doer) himself. A wordly person is better than Him as atleast he is always fearful.


वचन वेद अनुभव युगति आनन्द की परछाहि
बोध रुप पुरुष अखंडित, कहबै मैं कुछ नाहि।

Vachan ved anubhav yugati aanand ki parchhahi
Bodh roop purush akhandit,kahbai main kachhu nahi

भावार्थ: वेदों के वचन,अनुभव,युक्तियाॅं आदि परमात्मा के प्राप्ति के आनंद की परछाई मात्र है। ज्ञाप स्वरुप एकात्म आदि पुरुष परमात्मा के बारे में मैं कुछ भी नहीं बताने के लायक हूॅं।

Meaning: Sayings of vedas, experiences of skill are only shadows of pleasure. God is the wisdom incarnate indivisible which can never be explained.

ज्ञानी भुलै ज्ञान कथि निकट रहा निज रुप
बाहिर खोजय बापुरै, भीतर वस्तु अनूप।

Gyani bhulai gyan kathi nikat nij roop
Bahir khojay bapurai,bhitar vastu anoop.

भावार्थ: तथाकथित ज्ञानी अपना ज्ञान बघारता है जबकी प्रभु अपने स्वरुप में उसके अत्यंत निकट हीं रहते है। वह प्रभु को बाहर खोजता है जबकी वह अनुपम आकर्षक प्रभु हृदय के विराजमान है।

Meaning: A so called wise is lost in describing his wisdom,the God is near to him But he is searching Him outside when inside him is the matter most excellent.

अंधो का हाथी सही, हाथ टटोल-टटोल
आंखांे से नहीं देखिया, ताते विन-विन बोल।

Andhon ka haathi sahi,hath tatol-tatol
Aankhen se nahi dekhiya,tate vin-vin bol.

भावार्थ: वस्तुतः यह अंधों का हाथी है जो अंधेरे में अपने हाथों से टटोल कर उसे देख रहा है । वह अपने आॅखों से उसे नहीं देख रहा है और उसके बारे में अलग अलग बातें कह रहा है । अज्ञानी लोग ईश्वर का सम्पुर्ण वर्णन करने में सझम नहीं है ।

Meaning: The elephant as known by a blind is learnt only by groping in the dark. To know Him you need an eyes of a different kind.

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कबीर के दोहे-भाग 1-अनुभव: Kabir Ke Dohe-Experience
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