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केवट की प्रभु श्री राम के प्रति अनपायनी भक्ति

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केवट की प्रभु श्री राम के प्रति अनपायनी भक्ति

जब केवट ने प्रभु श्री राम को गंगा पार उतार दिया और प्रभु ने उसे पार उतरा कुछ देना चाहा तो केवट ने कुछ भी लेने को अस्वीकार कर दिया| केवट कहता है :

“बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि “बनि” भलि भूरी।।
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
फिरति बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।”

केवट को श्रीराम चरणामृत प्राप्ति अर्थात् पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति है और वह कामना रहित हो गया जो श्रीराम भक्ति प्राप्ति के उत्तम साधन है….

“बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।। “

केवट कहता है कि -हे प्रभु! मैं बालपन से इस तीसरे पन तक बहुत मजदूरी करते आ रहा हूँ। ऐसी बात नहीं कि मैं पहली बार किसी को गंगा पार ले जा रहा हूँ लेकिन जो आनंद आज आपको गंगा पार करने में है ,वह पहले कभी नहीं मिली।हे स्वामी! मुझे धन धान्य के रूप में पहले भी मजदूरी मिली। लेकिन आज वाला मजदूरी(प्रभु चरणामृत) का कहना ही क्या है। हे नाथ! मेरे योग्यता पर विचार करने पर वह मजदूरी कई गुणा अधिक लगता है क्योंकि हमारे तो…

“हम जड़ जीव, जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं।।”

हे नाथ! आप मेरे अवगुण देखकर मुझे मुद्रिका देकर अपने कृपा अनुग्रह से वंचित न करें। हमने जीवन में कितने जीवों की हत्या की लेकिन हमारे तन पर बढ़िया वस्त्र हैं और न भरपेट भोजन ही मिलता है।

सपनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ ???

सो हे नाथ! अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। हे दीन जनों पर दया करने वाले प्रभु दीनदयाल! आपके कृपा अनुग्रह से मुझे कुछ नहीं चाहिए। और प्रभु! मैंने पहले ही कहा था कि मुझे उतराई नहीं चाहिए।

केवट के बारंबार विनती करने पर भी श्रीराम जी उसे उतराई देना चाहते हैं तो केवट कहता है कि ठीक है प्रभु! आपने मुझे उतराई देने की प्रतिज्ञा कर ली है तो आपको इसके लिए कुछ कष्ट करना होगा!!

श्रीराम जी- कहो भैया! मुझे क्या करना होगा? अभी कहो !!!

केवट-” फिरति बार”- हे नाथ! जब आप चौदह वर्ष के वनवास की अवधि समाप्त कर वापस अयोध्या लौटने लगेंगे और उस समय…”मोहिं जो देबा “- आप मुझे जो भी देंगे ..”सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा” – हे स्वामी! मैं उस समय उस प्रसाद को सादर शिरोधार्य कर लूँगा।

ये मैं प्रतिज्ञा करता हूँ और आज यदि आप इसे प्रसाद कहकर देंगे तो भी आज मुझे नहीं लेना है स्वामी क्योंकि मैं वचनबद्ध हूँ कि..नाथ न उतराई चहौं।

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ , नहिं कछु केवट लेइ-

जब करुणा निवास प्रभु श्रीराम ने उसे मुद्रिका लेने को बहुत आग्रह किए लेकिन केवट तैयार नहीं हुआ । श्रीराम जी लक्ष्मण की ओर देखते हैं और मन ही मन कहते हैं कि हे लक्ष्मण! जरा तुम भी प्रयास कर लो कि तुम ही हठी भक्त हो या तुमसे भी आगे कोई है।

तब लक्ष्मण जी भी आग्रह किए कि – भैया केवट! हम तुम से नाराज नहीं हैं। वो मेरी भूल थी जो तुम जैसे अद्वितीय श्रीराम प्रेमी को समझ नहीं पाया ,अतः इस मुद्रिका को प्रसाद समझ कर ले लो। केवट लक्ष्मण आग्रह भी नहीं मानता तो माता सीताजी कहती हैं कि- भैया केवट! तुम ये न समझो कि मुझे इस मूल्यवान मुद्रिका को तूझे देने में कोई संकोच है। अरे भैया! तेरे स्नेह के आगे ये मुद्रिका तुच्छ है।

केवट कहता है कि आपलोग कहते हैं कि- मेरे स्नेह के आगे मुद्रिका तुच्छ है और मेरा मन कहता है कि प्रभु चरणामृत प्राप्ति के बाद इस मुद्रिका का मेरे जीवन में कोई महत्व नहीं रह जाता। आप ही कहें कि जब स्वयं प्रभु मेरे पास आकर मुझे चरणामृत प्रदान किए, तो बाकी क्या रह गया??

केवट कुछ लेने को तैयार नहीं है…

“दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवन जनाः”।।भागवत।।

आज प्रभु बड़े असमंजस में हैं कि ऐसे परम संतोषी को चौदह वर्ष प्रतिक्षा कराना अनुचित है अतः केवट को बिना माँगे ही वह दिया जाए जो माँगने पर भी सभी को नहीं देता हूँ…बिदा कीन्ह करूनायतन “भगति विमल”बरू देइ…

 

देखिए हनुमानजी जैसे अनन्य भक्त ने भी श्रीराम भक्ति मांगी है…नाथ भगति अति सुखदायनी।देहु कृपा करि अनपायनी।।

अत्रि मुनि-.  पदाब्ज भक्ति देहि मे।

अगस्त मुनि- यह बर मागउँ कृपानिकेता।बसहुँ हृदयँ श्री अनुज समेता।।
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा.।।

जटायु- अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम।

विभीषण- अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा शिव मन भावनी।।

शंकर जी…बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।

इन्द्र…दे भक्ति रमानिवास…

अर्थात् सभी ने श्रीराम जी से विमल भक्ति माँगे हैं लेकिन केवट कुछ नहीं माँगता है बल्कि कहता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए।
ऐसे दरिद्रता में भी परम संतोषी भक्त को श्रीराम जी अपनी विमल भक्ति प्रदान कर राहत महसूस करते हैं।

जबतक केवट को अपनी विमल भक्ति नहीं देते उन्हें बोझ लगता है।

श्रीराम के विमल भक्ति प्रदान कर विदा करने पर भी वह श्रीराम चरण निहारता है।

बालू पर पड़े श्रीराम पग धूलि को हृदय में उतारता है।
माथे चरण धूलि, अँखियों में पानी। श्रीराम भक्त ले लिया भक्ति की निशानी!!

आज केवट को श्रीराम जी से अटूट नाता जुड़ गया जो युगों युगों तक अमर हुआ….

देवता गण केवट पर पुष्प वर्षा करते हैं…
“धन्य केवट!”
“जय राम गोसाईं!!”

जय जय श्रीसीताराम

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