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तंत्रपीठ विंध्याचल

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तंत्रपीठ विंध्याचल

इस धाम की जो सबसे बड़ी विशेषता है, वह यह कि पर्वतमाला के अंचलों में श्रीयंत्र और लक्ष्मीयंत्र पर स्थापित विंध्याचल अनादिकाल से शक्ति की लीला स्थली रही है। पुराणों में इसे शक्तिपीठ,सिद्धपीठ और मणिद्वीप कहा गया है। जहां गंगा और विंध्य पर्वत का संगम होता है वहां उसके चरण स्पर्श कर गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं…

उत्तर प्रदेश का शहर मिर्जापुर देवी विंध्यवासिनी के कारण जगतप्रसिद्ध है। लोक विश्वास के अनुसार पहले इसका नाम गिरिजापुर था, मिर्जापुर बाद में हुआ। यहां तीन महत्त्वपूर्ण मंदिर त्रिकोण में स्थित हैं और बिना इस महात्रिकोण की परिक्रमा के विंध्यवासिनी का तीर्थ पूरा नहीं माना जाता। देवी भागवत के अनुसार 108 शक्तिपीठों में इस शक्तिपीठ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कहते हैं यहीं देवी पार्वती ने घोर तपस्या कर अपर्णा नाम पाया और सदा शिव को पति रूप में प्राप्त किया था।

भगवान श्री राम ने भी यहां के रामगंगा घाट पर अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण किया था तथा रामेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी।

इस धाम की जो सबसे बड़ी विशेषता है ,वह यह कि पर्वतमाला के अंचलों में श्रीयंत्र और लक्ष्मीयंत्र पर स्थापित विंध्याचल अनादिकाल से शक्ति की लीला स्थली रही है। पुराणों में इसे शक्तिपीठ,सिद्धपीठ और मणिद्वीप कहा गया है। जहां गंगा और विंध्य पर्वत का संगम होता है वहां उसके चरण स्पर्श कर गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं। और दक्षिण से घूम कर फिर विंध्य पर्वत को छूती हुई दक्षिण वाहिनी होती हैं। मां जगदंबा सदैव यहां निवास करती हैं।

प्राचीन काल से यह अत्यंत शक्तिशाली तंत्रपीठ रहा है और आज भी यहां अनवरत तांत्रिक क्रियाएं चलती रहती हैं। नवरात्रों में यहां अपरिमित सात्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है।


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यहां से दक्षिण की ओर पहले घने जंगलों में वन दुर्गा का एक प्राचीन मंदिर था। यहां तीनों महा शक्तियां (महालक्ष्मी,महाकाली, महासरस्वती )स्थित हैं और उनके होने की प्रत्यक्ष अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति होती है। यह महाशक्तिपीठ जागृत है जिसके उत्तर में महालक्ष्मी ,दक्षिण में महाकाली और पश्चिम में महासरस्वती विराजमान हैं। अनादिकाल से यहां की ये तीनों महाशक्तियां ऋषियों मुनियों की उपास्य रही हैं। कहते हैं त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल क्षेत्र का अस्तित्व सृष्टि से पूर्व का है तथा प्रलय के बाद भी समाप्त नहीं हो सकता, क्योंकि यहां महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती स्वरूपा आद्यशक्ति मां विंध्यवासिनी विराजती हैं।

श्रीमद्देवीभागवत के दसवें स्कंध के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने सबसे पहले स्वयंभुवमनु तथा शतरूपा को प्रकट किया। स्वयंभुवमनु ने देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न हो भगवती ने उन्हें निष्कंटक राज्य, वंश-वृद्धि, परमपद का आशीर्वाद दिया। वर देकर महादेवी विंध्याचल पर्वत पर चलीं गईं, जिससे स्पष्ट है कि सृष्टिकाल से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है और सृष्टि विस्तार उन्हीं के शुभाशीष से संभव हुआ।

त्रेतायुग में श्रीराम ने यहां देवी पूजा कर रामेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि द्वापर में वसुदेव के कुल पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचंडी का अनुष्ठान किया था।

मंत्रशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी को वनदुर्गा बताया गया है।

कहते हैं, ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। माता विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री हैं। यहां संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त होती है, इसलिए इन्हें सिद्धिदात्री भी कहते हैं। आदिशक्ति की लीला भूमि विंध्यवासिनी धाम में साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

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