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हमारे बुजुर्ग- एक उद्गार

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हमारे बुजुर्ग।

यह कविता हमारी रचना नही है.| किन्ही महानुभाव के सोशल मीडिया पेज से साभार उद्धृत है| हमारा अभिनंदन ऐसे सद्पुरुष को जिन्होने ऐसी सटीक और सुसामयिक कविता बनाई| इस तरह के विषय पर रचनायें आज कल कम ही देखने को मिलती हैं|हमारे हिसाब से यह संदेश फैलाना ज़्यादा महत्वपूर्ण है, रचनाकार को साधुवाद देते हुए हम यह रचना यहाँ उद्धृत करते हैं  ::

चढ़ता दरिया बनकर और उफान के
गर पाना चाहे मंजिल कोई
देकर मशविरा तहजीब का, एक तजुर्बा बन जाते हैं,
हमारे बुजुर्ग।

जब कभी फितरत में रंगीन मिजाजी,
पुरजोर हो जाती है हमारे,
फैला के आंचल हमारे मुकद्दर पर, एक साया बन जाते हैं,
हमारे बुजुर्ग ।

कैसे ताउम्र बच्चों की परवरिश
और उनकी बेहतरी के जज्बे में,
मौत के हर कदम पर अपनी, सांसों को जीतते जातें हैं,
हमारे बुजुर्ग।

जिनकी दुआओं से ही हमें हासिल होते हैं
ये शोहरत और ये मुकाम,
कांपता हाथ सर पर रखते ही, राह के पत्थर हटा देते हैं,
हमारे बुजुर्ग ।

बनके सरपरस्त जब हमें,
लपेट लेते हैं अपने बाहुपाश में प्यार से,
घर-आंगन में चांदनी लेकर, चांद बनकर उतर आतें है,
हमारे बुजुर्ग ।

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छोरा गंगा किनारे वाला

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