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परशुरामजी ने नही काटा था माता रेणुका का सर

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पुरी पोस्ट जरा एक-एक शब्द-वाक्य को ध्यान से पढ़े , अधुरा पढ़ेगे तो ये जानकारी देने का कोई फायदा नहीं |

ऋषि जमदग्नि के अभूतपूर्व प्रचंड आक्रोश से कोलाहल मच गया | आज्ञा पुरा नहीं करने पर जब रूमण्वान्, सुषेण,वसु और विश्वावसु को भष्म कर दिए और पुरे आश्रमवाशी पुकारने लगे की ,

“परशुराम कहाँ हो , ऋषि चायमान दौड़ो , आप लोग ही महाविनाश से बचा सकते हैं “

अंतत: राम परशु हाथ में उठाए हुए किशोर हरिण-सा, चायमान चाल में उड़ता हुआ प्रतित होता आ रहे थे , आँधी जैसी गति परशुराम को ऋषि चायमान ने सिखाई थी, पिछे चायमान भी उसी चाल से अनुगमन करते आ रहे थे |

राम सदा निर्भय रहते थे, निर्द्वद्व | उसमें अनिर्णय, संशय, धर्मसंकट जगता हीं नहीं था | वह भीड़ द्वारा दि गई राह से आगे आए और परशु को बगल में दबाकर पिताश्री को दंडवत् प्रणाम करने लगे, ऋषि चायमान भी हाँफते हुए पिछे से आ पहूँचे | वह सब सुन चुके थे और उन्होंने निर्णय भी ले लिया होगा क्योंकि परशुराम की ओर झुककर कुछ बुदबुदा रहे थे |


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परन्तु परशुराम दिव्य आवेश में थे | वह अपनी माँ को देखते हीं क्रोधित हो उठे | यदि पिता के अलावा कोई अन्य माता को ऐसा त्रास देता तो उसका सिर अब तक कटकर अलग जा गिरता किंतु परशुराम पिता की आज्ञा के लिए उन्हें नत-नयन देख रहे थे और करबद्ध थे —

“राम मेरा आदेश है कि तुम इसी क्षण इस पथभ्रष्ट रेणुका का शिरच्छेद करो, यह हन्यमान है इसे हनो पुत्र “

परशुराम को व्याकुल देख ऋषि चायमान ने उनके कान में कुछ कहे और परशुराम ने अविलंब परशु दाहिने हाथ में लिए और सिर झुकाए खड़ी माता के कंठ के पिछे के भाग पर तान दिया | लोगो ने बस परशु चलने का एक चमक देखी कौंध देखी और त्राहि त्राहि चिल्ला उठे | रेणुका गिर पड़ी और रक्त निर्झर उठा तब चायमान ने अपना उत्तरीय फाड़कर माता के घाव पर बाँध दिया |

” कोई और आदेश पिताश्री ? “

इस घटनाक्रम में  ऋषि चायमान ने जो श्री परशुराम जी के कान में बुदबुदाए थे वो परशुराम की चतुराई दिखाता है | वह जानते थे की वो माता को मार नहीं सकते थे | और पिता चमत्कारी भी हैं क्योंकि भृगुओं ने सर्वप्रथम अथर्ववेद की यातुविद्या और तांत्रिक साधनाओं को अपनाया था | उशना या शुक्राचार्य, उर्व, ऋचीक आदि महान भृगु यज्ञक्रिया के अतिरिक्त अष्टसिद्धियों और अभिचार-विद्या के भी अभ्यासी थे | मारण-मोहन-स्तंभन-उच्चाटन-वशीकरण के रहस्यमय अभ्यासो को भृगुओं ने वैदिक सनातन में स्वीकृति दिला दी थी |

ऋषि चायमान राम की अनिच्छा के वावजुद उसे अथर्ववेदी तंत्रसाधना के अभ्यास शक्तियाँ , सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे | परशुराम जानते थे की पिता की अंधी आज्ञा का पालन करने पर उनका पुरूष अहंकार संतुष्ट हो जाएगा | नारी सदा क्षम्य, अवध्य है |

परशुराम ने रेणुका पर जो परशु से प्रहार किया था वह  चायमान द्वारा सिखाया गया एक विद्या ” प्रदर्शन-प्रहार ” था | इस प्रहारकला का रहस्य है कि बलपुर्वक परशु की मार के क्षण अचानक हाथ रोक लिया जाता था और रशु बस एक-आध इंच खाल काट सके , हड्डी न कटे इसका ध्यान रखा जाता था और आधात से लंबी निद्रा में चला जाता था |

ऋषि चायमान ने राम के कान में यहीं बुदबुदाया थी की प्रदर्शन प्रहार करो , पिता भी प्रसन्न और माता भी सुरक्षित यद्पि घाव तो हुआ ही था जो जमदग्नि की अथर्ववेदी जड़ीबुटियों और रासायनिक भष्मों के सेवन से सूख रहा था तो भी रेणुका पट्टी बाँधे रहती थी | पट्टी तब ही खुले जब व्रण पुरी तरह सुख जाए क्योंकि खुला घाव किटों को आकर्षित करता है |

चायमान परशुराम को सेना खड़ी करना , व्यूह रचना , युद्ध-प्रक्रिया , घात-प्रतिघात, आदी सब सिखाते थे और अभ्यास कराते थे |

ॐ जय_श्री_परशुराम ॐ

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