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शहीदी सप्ताह 20 से 27 दिसम्बर

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कोटि-कोटि प्रणाम शहीदों को


20 से 27 दिसम्बर – शहीदी सप्ताह : इन सात दिनों के अन्दर श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपना पूरा परिवार देश एवं धर्म के लिए कुर्बान कर डुबते धर्म को बचा लिया |

2 छोटे साहिबजादे सरहिन्द की दीवार मे जिन्दा चिनवा दीये 
2 बड़े साहिबजादे चमकौर की जंग में शहीद कर दिये गये 
माता गुज़र कौर जी, जान से भी प्यारे सिक्ख शहीद हो गयें 

धन गुरू गोबिन्द सिंह जी– धन धन गुरू गोबिन्द सिंह जी कोटि प्रणाम शहीदों को

इन पुतरन के सीस पर वार दिए सुत चार।
चार मुए तो क्या हुआ, जीवत कई हज़ार ॥

गुरु गोविंद सिंह जी के चारों पुत्र अत्याचारी मुग़लों के द्वारा शहीद कर दिए गए, तब दशमेश ने ज़ुल्म, अन्याय के विरुद्ध युद्ध में साथ देने वाले अपने सभी अनुयायियों और सभी दीन-दुखियारों को अपना पुत्र बताते हुए कहा कि इन पुत्रों की रक्षा के लिये मैंने अपने चार पुत्र न्योछावर कर दिए। ज़ुल्म के विरुद्ध चार मारे भी गए तो क्या हुआ कई हज़ार जीवित हैं।

चमकौर के युद्ध में गुरु गोविंद सिंह के बड़े साहिबज़ादों श्री अजीत सिंह और श्री जुझार सिंह जी को मुग़ल सैनिकों ने छल से शहीद कर दिया। छोटे सहिबज़ादे श्री फतह सिंह, श्री जोरावर सिंह और उनकी दादी गुजरी देवी गुरु गोविंद सिंह जी से बिछड़ गए थे। सरहिंद के नवाब वज़ीर ख़ान ने कड़ाके की सर्दी के मौसम में माता गुजरी और छोटे साहिबज़ादों को एक मीनार की छत पर क़ैद कर के रखा। इस्लाम क़ुबूल करने से साफ़ इनकार करने पर छोटे साहिबज़ादों को ज़िंदा दीवार में चिनवा कर शहीद कर दिया गया। अपने नन्हें मासूम पोतों की मृत्यु की ख़बर सुन माता गुजरी भी जीवित नहीं रह सकीं।

तस्वीर उसी दीवार की है जहाँ छोटे साहिबज़ादों को ज़िंदा चिनवाया गया था। छोटे साहिबज़ादों की संकल्प शक्ति ईंट की दीवार से कहीं ज़्यादा मज़बूत थी।

गुरु गोविंद सिंह जी के पिता गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति पहले ही दे दी थी। इस प्रकार गुरु महाराज के पूरे परिवार ने देश, धर्म के लिये अपने प्राणों की आहुति दी। इतिहास में ऐसी मिसाल शायद ही कोई और मिले।

20 दिसंबर से 27 दिसंबर के बीच की यही वह अवधि है जब गुरु गोविंद सिंह जी के चारों पुत्रों और माता गुजरी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।  अफ़सोस इस बात का है कि जिन लोगों के लिये दशमेश महाराज के पूरे परिवार ने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, उन लोगों ने उनकी अमर बलिदानी को भुला कर एक विदेशी थोपा हुआ त्योहार मनाने में व्यस्त है। इस देश के लोग लायक नहीं है गुरु गोविंद सिंह जी के पूरे परिवार की क़ुरबानी के।

Myrtordom Week 20-27 December

Baba Zorawar Singh ji and Baba Fateh Singh ji, the two youngest son’s of Guru Gobind Singh ji were bricked alive.

There was a moment when the bricklayer was forced to cut the knee cap of Baba Fateh Singh ji because it was getting in the way of the wall. Such cruelty was the trademark of Mughals forces driven by religious bigotry.

Every time a layer of bricks was laid. …….. The young Sahibzaades would say

“WAHEGURU JI KA KHALSA, WAHEGURU JI KI FATEH!!!!”

Eventually….the wall fully encased the two young Princes. The young warrior of Dhrama became unconscious due to lack of oxygen and blood loss.

It is said that a lightning bolt from the heavens smashed the wall and revealed the unconscious young Princes. At this point Wazir Khan gave the order to the executioner to severe the heads of the Young Sahibzaades.

This is how Baba Zorawar Singh ji and Baba Fateh Singh ji attained Martyrdom.

Mata Gujri ji watched this gruesome act. Mata ji then sat down and started recitation of Jap ji Sahib. She gradually ascended into the state of Samadhi. Her soul was immersed with Akaal Purakh.


WE PAY HOMAGE TO THESE GREAT SOULS….

Tribute to Mata Gujri ji, Baba Zorawar Singh ji and Baba Fateh Singh ji

Dhan Dhan Baba Zorawar Singh ji!
Dhan Dhan Baba Fateh Singh ji!
Dhan Dhan Mata Gujri ji!

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