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धूर्त सियार की दुर्गति

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धूर्त सियार की दुर्गति

(पुरानी ग्रामीण आँचलिक कहानी)

एक था सियार। बदमाशों का सरदार। रोज़ एक किसान के झोंपड़े में घुसता, मटकी फोड़ता और मटकी में बना भात खाकर चला जाता। किसी तरह पकड़ में नहीं आता था।

एक दिन किसान अपने खेत पर गया ही नहीं। वह दिन-भर एक पेड़ की आड़ में छिपा रहा। दोपहर हुई। सियार आया। उसने खपरैल आगे-पीछे किए और ऊपर से अन्दर गया। मटकी फोड़ी। भात खाया। किसान ने सब देखा और कहा, “हां, यह तो इसीकी करतूत है। इसे एक बार पकड़कर इसकी अच्छी मरम्मत करूंगा।”

जैसे ही सियार बाहर जाने को निकला, किसान ने फन्दा डाकर उसे पकड़ लिया, और पेड़ की डाल पर औंधे मुंह लटका दिया। सियार ने औंधे मुंह के साथ खूब झूला झल लिया। जाते-जाते किसान अपनी घरवाली से कहता गया, “सुनती हो! आज हमें इस सियार को पकाकर खाना है। मैं कुछ ही देर में लौटकर आऊंगा और इसे काटूंगा।”

सियार ने सुना, तो उसके होश गायब हो गए। लेकिन उसने हिम्मत से काम लिया। सोचा—‘मरना तो है ही। देखूं, किसी तरकीब से छुटकारा मिल जाए, तो अच्छा है।’

किसान की घरवाली धान कूट रही थी। बार-बार मूसल चलाकर वह थक रही थी। मौक़ा देखकर सियार बोला, “मां, तुम नाहक इतनी मेहनत क्यों करती हो? तुम्हारा सारा धान तो मैं ही कूट दूंगा। मुझे धान कूटने की आदत है।” किसान की घरवाली सियार के कहने में आ गई। भोली जो ठहरी! उसने सियार की रस्सी खोल दी। सियार गम्भीर बनकर धान लूटने बैठा। बैठे-बैठे सोचता रहा—‘कब मौक़ा मिले, और मैं कब भागूं?’ इसी बीच घरवाली किसी काम से घर के अन्दर गई, और सियार नौ-दो ग्यारह हो गया। और दूर जंगल में बनी अपनी गुफा में जा पहुंचा।

सियार को गया देखकर किसान की घरवाली रोने लगी, “हाय राम! अब क्या होगा? वे खेत पर से आयेंगे और कहेंगे कि, “ला, मेरा सियार ला’ तो मैं उनसे क्या कहूंगी?”

घर के अन्दर रहने वाले एक चूहे ने उसका रोना सुना। वह अपने बिल में से बाहर निकला और बोला, “मां! तुम रोती क्यों हो? सियार को तो मैं अभी लिवा लाता हूं। तुम रोना बन्द करो।”

किसान की घरवाली बोली, “भैया! तुम उसे ला दोगे तो मैं तुम्हारा बड़ा एहसान मानूंगी। तुम्हें रोज़ भरपेट खाना खिलाऊंगी।”

चूहा बोला, “मां! तुम मेरी पूंछ से एक टोकनी बांध दो, और उसमें खाने की कुछ चीज़ें रख दो।” घरवालों ने चूहे की पूंछ से एक टोकनी बांध दी और उसमें खाने का कुछ सामान रख दिया। अब चूहा सियार की खोज में निकल पड़ा। जंगल में घूम-घूमकर उसने सियार को गुफा खोज ली। अन्दर सियार सोया पड़ा था।

सियार मारे डर के अपनी गुफा के बाहर निकला ही नहीं। कहीं किसान उसके पीछे-पीछे चला आए और फिर उसे पकड़कर मारने लगे तो क्या होगा? लेकिन इस बीच सियार को ज़ोर की भूख लगी थी। तभी टोकनी लेकर चूहा उसकी गुफा के सामने पहुंचा। टोकनी में बढ़िया खाना रखा था। देखकर सियार के मुंह में पानी आ गया। उसने अपनी गुफा के बाहर झांका, तो वहां उसे चूहा दिखाई पड़ा। बोला, “ओ हो! यह तो चूहा है। चलूं, बाहर निकलूं और इससे खाना मांग लूं।‘’

सियार ने कहा, “चूहे भैया! मुझे थोड़ा खाना दोगे? बहुत ज़ोर की भूख लगी है।”
चूहा बोला, “खाना मुफ्त में कैसे दिया जाय? तुम मेरा एक काम कर दो, तो मैं तुमको खाना खिला दूं।”
सियार ने कहा, “बताओ, काम क्या है?”
चूहा बोला, “मुझे एक गट्ठर घास चाहिए। तुम उसे अपनी पीठ पर रखकर मेरे घर तक पहुंचा दो।”
सियार ने काह, “मुझे मंजूर है।”

सियार की पीठ पर घास का गट्ठर रखकर चूहा और सियार दोनों चल पड़े। आगे-आगे चूहा, पीछे-पीछे सियार। कुछ दूर जाने के बाद चूहे ने दो पत्थर खोज लिए और वह उन पत्थरों को आपस में रगड़ने लगा।

सियार ने पूछा, “चूहे भैया! यह तुम क्या कर रहे हो?”

चूहा बोला, “मैं इन्हें रगड़ रहा हूं। यह तो हमारा रोज़ का काम है।” कुछ ही देर में दोनों पत्थरों को रगड़ने से जो चिनगारी निकली, चूहे ने उसे घास के गठ्ठर में डाल दिया। धास धू-धू करके जल उठी।

सियार चिल्लाया, “अरे, यह क्या कर रहे हो?”

चूहा बोला, “धूं-धूं कर रहा हूं। हम तो हमेशा ऐसा ही किया करते रहते हैं।” घास जल गई, और उसके साथ सियार की पीठ भी कुछ जल गई। चीखता-चिल्लाता सियार अपनी गुफा में जा घुसा।

दूसरे दिन चूहा वैद्य बनकर निकला। गुफा के पास पहुंचकर बोला:
दांत का दरद मिटा दूं।
बादी का दरद मिटा दूं।
जले परमरहम लगा दूं।

सुनकर सियार बाहर निकलां बोला, “भैया! दवा दोगे?”
चूहे ने पूछा, “कैसी दवा चाहिए?”
सियार ने कहा, “जली चमड़ी पर लागने की दवा।”
चूहा बोला, “लो, यह मरहम, जली हुई जगह पर ठीक से लगा लो।”

कहकर चूहे ने सियार को पिसी हुई मिच्र की एक गोली दे दी। सियार ने मिर्चवाला मरहम लगा लिया, फिर वह बुरी तरह चीखने-चिल्लाने और रोने लगा, “अरे, तुमने मुझे यह कैसा मरहम दिया?”
चूहे ने कहा, “यह तो तुम्हें जलाने वाली आग है, आग!

सियार रोता-चिल्लाता गुफा के अन्दर चला गया। वहीं से बोला, “अब इस गुफा में तो मैं रहूंगा ही नहीं।”  सियार गुफ़ा छोड़कर नदी-किनारे पहुंचा। चूहा भी उसके पीछे-पीछ गया। चूहा वहीं बैठा-बैठा लकड़ी कुरेदने लगा।

सियार ने कहा, “चूहे भैया! कुछ खाने की चीज़ दिलाओगे?”
चूहा बोला, “हम नदी के उस पार पहुंच जायं तो वहां कुछ मिल सकता है। इसीके लिए मैं यह नाव बना रहा हूं।”
सियार ने कहा, “मुझे भी नाव बनान सिखा दो।”
चूहा बोला, “तुम उस घास की नाव बना लो।”
सियार ने घास की नाव बनाई और चूहे ने लकड़ी की।

दोनों ने अपनी-अपनी नाव नदी में डाल दी। कुछ ही दूर जाने पर घासवाली नाव डूब गई और सियार पानी में डुबकियां खाने लगा। चूहे की नाव पानी में तैरती रही और चूहा नाव में नाचता रहा।

इस बीच सियार अधमरा हो गया। चूहे ने उसके गले में रस्सी डालकर उसे पकड़ लिया और घसीटकर घर तक ले आया। फिर किसान के घर जाकर उसकी घरवाली से बोला, “मां, मां! लो, यह सियार हाज़िर है। अब तुम रोना मत!”

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