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लोग अवतारों का उपहास क्यों उड़ाते हैं?

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यह मूलतः संस्कार और अज्ञानता के कारण है। बहुत समय से हिन्दू धर्म की मान्यताओं पर आघात हुए जा रहे हैं। पश्चिमी शिक्षा पद्धति के प्रभाव से अधिकतर हिन्दू अपने ही उपासना पद्धति को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। न तो उन्हें अपने धर्म के मूल के बारे में सही से पता होता है और न तो दूसरे धर्म की कमियों के बारे में अतः किसी के द्वारा धर्म पर आक्षेप किये जाने पर सही उत्तर न सूझने पर अपने ही धर्म में कमियां निकलने लगते हैं।

सनातन धर्म में निर्गुण और सगुण उपासना पद्धति दोनों को ही मान्यता दी गयी और बताय गया है की मूलतः निर्गुण ब्रह्म ही भक्तों की इच्छा के अनुरूप सगुण रूप ग्रहण करता है। तुलसीदास जी ने कहा है की

‘अंक अगुन आखर सगुन…. ‘

अर्थात जैसे कोई संख्या को आप प्रतीकात्मक रूप से १ ,२, ३ , ४ आदि लिख सकते हैं वैसे ही उसे अक्षरों में एक , दो , तीन , चार…. आदि भी लिख सकते हैं। दोनों ही तरीकों से आप एक ही बात को कहेंगे। इसमें आप अंक प्रतीक १ ,२, ३ , ४.. को निर्गुण समझें और अक्षरों में एक , दो , तीन , चार .. को सगुण अर्थात गुणों को धारण करने वाला साकार रूप अवतार समझें।

सगुण निर्गुण तक ही पहुंचने का मार्ग हैं और उसी तत्व का निरूपण करते हैं।


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विधर्मियों द्वारा हमारे सगुण रूपों की बहुत अनुचित आलोचना की गयी है , इसके पीछे उनका उद्देश्य धर्म परिवर्तन करना ही रहा है।

हालाँकि यदि हम वेद के मूल में निर्गुण का सही स्वरुप जानेंगे तो पाएंगे तो पाएंगे की उनके निराकार कहे जाने वाले गॉड , अल्ला निर्गुण बिलकुल नहीं हैं। कारण उनमें अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति अनुचित द्वेष , अपने अनुयाइयों के लिए पक्षपात और अकारण हिंसा के आदेश जैसे आदि बहुत से दुर्गुण हैं। परन्तु हिन्दू सनातन धर्म के मूल को स्वयं न जानने के कारण उचित संस्कार अपने संतानों को नहीं दे पाते। जिस से वो अनुचित शिक्षा का प्रतिकार नहीं कर पाते।

इस दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण देश में गुरुकुलों का बंद होना भी है। मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को लागू करते समय गुरुकुल शिक्षा पद्दति को अमान्य घोषित कर दिया जिससे गाँव-गाँव और शहरों में भी चलने वाले लाखों चटशालायें बंद हो गयीं। उन्हें अवैध घोषित कर उनमे शिक्षा अपराध घोषित कर दिया।

यही से हमारे मूल से जुड़ाव ख़त्म हुआ और संस्कृति के प्रति ज्ञान भी। साथ में हमारी परम्पराओं का उपहास भी बनाया जाने लगा। आज गुरुकुल नहीं हैं पर इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस युग में ज्ञान की कमी नहीं है , खुद भी पढ़ें और अपनी सन्तानो को भी उचित संस्कार दें। जब उन्हें समुचित ज्ञान हगा तो खुद ही प्रतिकार करेंगे और उपहास करने वाले खुद उपहास का पात्र बन जायेंगे।

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धर्मो रक्षति रक्षितः