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देव दीपावली व्रत कथा विधि फल एवं महत्व

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    हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। पूरे कार्तिक माह में पूजा, अनुष्ठान, जप,तप और दीपदान का विशेष महत्व होता है। कार्तिक माह में ही देवी लक्ष्मी जी का जन्म हुआ था और इसी महीने में भी भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागे थे।  

दीपावली के 15 दिनों के बाद कार्तिक पूर्णिमा तिथि पर देव दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।कार्तिक पूर्णिमा को  त्रिपुरारी पूर्णिमा, त्रिपुरारी पूर्णमासी के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में वर्णित है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था ।  

 कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही समस्त देवी-देवता स्वर्ग से धरती पर आते हैं और गंगा स्नान करने के बाद दीपोत्सव का त्योहार मनाते हैं। देवताओं के पृथ्वी आगमन  पर  उनके स्वागत में धरती पर दीप जलाये जाते हैं ।देव दिवाली पर लोग अपने घर पर दीए और सुंदर सुंदर रंगोली से मुख्य द्वार को सजाते हैं।  

 इस दिन देवलोक से सभी देवी- देवता गण पवित्र नगरी वाराणसी यानि काशी में में आगमन के अवसर पर काशी में बहुत साज-सज्जा की जाती है।देव दीवाली को मुख्य रूप से शिव की नगरी वाराणसी में बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। इस दिन गंगा आरती के साथ गंगा के घाटों और शहर की हर गली में दीपक से रोशनी की जाती है।  

इसी दिन भगवान शिव ने तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली के त्रिपुरों का नाश किया था। त्रिपुरों का नाश करने के कारण ही भगवान शिव का एक नाम त्रिपुरारि भी प्रसिद्ध है। इसी पूर्णिमा के भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था।इसलिए इसे देव दिवाली भी कहते हैं. इस दिन गंगा-स्नान तथा सायंकाल दीपदान का विशेष महत्त्व है।    


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कृत्तिकाओं का पूजन है जरूरी-  

इस दिन छह कृत्तिकाओं का रात्रि में पूजन करना चाहिए. इस पूजा से संतान का शीघ्र वरदान मिलता है. ये छह कृत्तिकाएं हैं- शिवा, सम्भूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा. इनका पूजन करने के बाद घी आदि का दान करना चाहिए. कृत्तिकाओं से संतान और सम्पन्नता प्राप्ति की प्रार्थना करनी चाहिए.  

भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व-   भगवान शिव ने इस दिन त्रिपुरासुर का वध किया था. इसलिए इस दिन को ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है. शिव जी की विशेष पूजा से इस दिन तमाम मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस दिन उपवास रखकर शिव जी की पूजा करके बैल का दान करने से शिव पद प्राप्त होता है. शिव ही आदि गुरू हैं, इसलिए इस दिन रात्रि जागरण करके शिव जी की उपासना करने से गुरू की कृपा प्राप्त होती है. गलतियों के प्रायश्चित के लिए भी इस दिन शिव जी की पूजा की जाती है.  

मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र में भगवान शिव के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है. इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है.  

कार्तिक माह में लोग गंगा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान आदि करते हैं। कार्तिक महीने के दौरान गंगा में स्नान करने की शुरुआत शरद पूर्णिमा के दिन से होती है और कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होती है। कार्तिक पूर्णिमा उत्सव पांच दिनों तक चलता है।  

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा

दैत्य तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली। जब भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो उसके पुत्रों को बहुत दुःख हुआ।

उन्होंने देवताओं से बदला लेने के लिए घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए तो उन्होंने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान माँगने के लिए कहा।  

तब उन तीनों ने ब्रह्माजी से कहा कि, आप हमारे लिए तीन नगरों का निर्माण करवाईए। हम इन नगरों में बैठकर सारी पृथ्वी पर आकाश मार्ग से घूमते रहें। एक हजार साल बाद हम एक जगह मिलें। उस समय जब अभिजीत नक्षत्र में, हमारे तीनों पुर (नगर) एक सीध में आयें तब असंभव रथ पर, असंभव बाण से, यदि बिना कोई क्रोध किये हुए व्यक्ति उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो।

ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।   ब्रह्माजी का वरदान पाकर तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया। उनमें से एक सोने का, एक चाँदी का व एक लोहे का था। सोने का नगर तारकाक्ष का था, चाँदी का कमलाक्ष का व लोहे का विद्युन्माली का।  

अपने पराक्रम से इन तीनों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। इन दैत्यों से घबराकर इंद्र आदि सभी देवता भगवान शंकर की शरण में गए। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव त्रिपुरों का नाश करने के लिए तैयार हो गए। विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया।  

चंद्रमा व सूर्य उसके पहिए बने, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर आदि लोकपाल उस रथ के घोड़े बने। हिमालय धनुष बने और शेषनाग उसकी प्रत्यंचा। स्वयं भगवान विष्णु बाण तथा अग्निदेव उसकी नोक बने। उस दिव्य रथ पर सवार होकर जब भगवान शिव त्रिपुरों का नाश करने के लिए चले तो दैत्यों में हा-हाकर मच गया।  

दैत्यों व देवताओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया। जैसे ही त्रिपुर एक सीध में आए, भगवान शिव ने दिव्य बाण चलाकर उनका नाश कर दिया। त्रित्रुरों का नाश होते ही सभी देवता भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे। त्रिपुरों का अंत करने के लिए ही भगवान शिव को त्रिपुरारी भी कहते हैं।  

जिस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरों का संहार किया था, वह कार्तिक पूर्णिमा का दिन था।  इससे सभी देवों को अत्यंत प्रसन्नता हुई। तब सभी देवतागण भगवान शिव के साथ काशी पहुंचे और दीप जलाकर खुशियां मनाई।  

कार्तिक पूर्णिमा विधि

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। अन्न, धन एव वस्त्र दान का बहुत महत्व बताया गया है इस दिन जो भी आप दान करते हैं उसका आपको कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि आप जो कुछ आज दान करते हैं वह आपके लिए स्वर्ग में सरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में आपको प्राप्त होता है।  

शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।  

कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था। सिख सम्प्रदाय को मानने वाले सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सौगंध लेते है।  

Dev Deepawali Varanasi

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