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श्री (चौरासी) 84 सिद्ध चालीसा | Shri 84 Sidh Chalisa

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चौरासी सिद्धों और नवनाथ गुरुओं ने सनातन धर्म की कठिन काल में सर्वदा सहायता की है और दीं दुखियों का सर्वदा कल्याण किया है। यह उन्ही का प्रताप है कि हमारे देश ने कभी संत महात्माओं को पैदा करना बंद नहीं किया। देश , काल समाज और विश्व पर इनका महती उपकार है.।इन्ही सिद्धों कि उपासना के में प्रयोग होने वाला प्रस्तुत है ‘श्री चौरासी 84 सिद्ध चालीसा (Shri 84 Sidh Chalisa )

श्री (चौरासी) 84 सिद्ध चालीसा

॥दोहा॥

श्री गुरु गणनायक सिमर , शारदा का आधार ।
कहूँ सुयश श्री नाथ का , निज मति के अनुसार।।

श्री गुरु गोरक्षनाथ के , चरणों में आदेश।
जिन के जोग प्रताप को , जाने सकल नरेश ।।


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॥चौपाई॥

जय श्री नाथ निरंजन स्वामी , घट घट के तुम अन्तर्यामी।
दीन दयालु दया के सागर , सप्तद्वीप नवखंड उजागर।

आदि पुरुष अद्वैत निरंजन , निर्विकल्प निर्भय दुख भंजन।
अजर अमर अविचल अविनाशी , रिद्धी सिद्धि चरणों की दासी।

बाल यती ज्ञानी सुखकारी , श्री गुरुनाथ परम हितकारी।
रूप अनेक जगत में धारे , भगत जनों के संकट टारे।

सुमिरन चौरंगी जब कीन्हा , हुए प्रसन्न अमर पद दीन्हा।
सिद्धों के सिरताज मनाओ , नवनाथों के नाथ कहावो।

जिसका नाम लिए भव जाल , अवागंमन मिटे तत्काल।
आदिनाथ मत्स्येन्द्र पीर, धोरामनाथ धुंधली वीर।

कपिल मुनि चर्पट कुण्डेरी , नीमनाथ पारस चगेरी।
परशुराम जमदग्नि नंदन , रावण मार राम रघुनन्दन ।

कंसादिक असुरन दलहारी , वासुदेव अर्जुन धनुर्धारी ।
अन्चलेश्वर लक्ष्मण बलबीर , बलदाई हलधर यदुवीर।

सारंगनाथ पीर सरसाईं , तुंगनाथ बद्री बलदाई।
भूतनाथ धरीपा गोरा , बटुकनाथ भैरो बल जोरा ।

वामदेव गौतम गंगाई , गंगनाथ धोरी समझाई।
रतननाथ रण जीतन हारा , यवन जीत काबुल कंधारा।

नागनाथ नाहर रमताई , बनखण्डी सागर नन्दाई।
बंकनाथ कन्थड सिद्ध रावल , कानीपा निरीपा चंद्रावल।

गोपीचंद भर्तृहरि भूप , साधे योग लखे निज रूप।
खेचर भूचर बाल गुन्दाई , धर्मनाथ कपली कनकाई।

सिद्धनाथ सोमेश्वर चंडी , भुसकाई सुन्दर बहुदण्डी।
अजयपाल शुकदेव व्यास , नासकेतु नारद सुख रास।

सनत्कुमार भारत नहीं निद्रा , सनकादिक शरद सुर इन्द्रा।
भंवरनाथ आदि सिद्ध बाला , च्यावननाथ मानिक मतवाला।

सिद्ध गरीब चंचल चन्दराई , नीमनाथ आगर अमराई।
त्रिपुरारी त्र्यम्बक दुःख भन्जन, मंजुनाथ सेवक मन रंजन।

भावनाथ भरम भयहारी , उदयनाथ मंगल सुखकारी।
सिद्ध जालंधर मूंगी पावे, जाकी गति मति लखि न जावे।

अवघड देव कुबेर भंडारी , सहजाई सिद्धनाथ केदारी।
कोटि अनन्त योगेश्वर राजा , छोड़े भोग योग के काजा।

योग युक्ति करके भरपूर , मोह माया से हो गए दूर।
योग युक्ति कर कुन्तिमाई , पैदा किये पांचो बलदाई।

धर्मं अवतार युधिष्ठिर देवा , अर्जुन भीम नकुल सहदेवा।
योग युक्ति पार्थ हिय धारा , दुर्योधन दल सहित संहारा।

योग युक्ति पांचाली जानी , दुशासन से यह प्रण ठानी।
पावूं रक्त न जब लग तेरा , खुला रहे यह शीश मेरा।

योग युक्ति सीता उद्धारी , दशकन्धर से गिरा उच्चारी।
पापी तेरा वंश मिटाऊँ , स्वर्ण लंका विध्वंस कराऊँ।

श्री रामचंद्र को यश दिलाऊं , तो मैं सीता सती कहाऊँ।
योग युक्ति अनसूया कीनो , त्रिभुवननाथ साथ रस भीनो।

देव दत्त अवधूत निरंजन , प्रगट भए आप जगवंदन।
योग युक्ति मैनावती कीन्ही , उत्तम गति पुत्र को दीन्ही।

योग युक्ति की बांछल मातू , गोगा जाने जगत विख्यातू।
योग युक्ति मीरा ने पाई , गढ चित्तौड़ में फिरी दुहाई।

योग युक्ति अहिल्या जानी , तीन लोक में चली कहानी।
सावित्री सरस्वती भवानी , पार्वती शंकर मनमानी।

सिंह भवानी मनसा माई , भद्रकाली सहजा बाई।
कामरू देश कामाक्षा जोगन , दक्षिण में तुलजा रस भोगन।

उत्तर देश शारदा रानी , पूरब में पाटन जग मानी।
पश्चिम में हिंगलाज बिराजे , भैरवनाद शंख ध्वनि बाजे।

नवकोटी दुर्गा महारानी , रूप अनेक वेड नहीं जानी।
काल रूप धर दैत्य संहारे , रक्त बीज रण खेत पछारे।

मैं जोगन जग उत्पत्ति करती , पालन करती संहार करती।
जती सती की रक्षा करनी , मार दुष्ट दल खप्पर भरनी।

में श्री नाथ निरंजन की दासी , जिनको ध्यावे सिद्ध चौरासी।
योग युक्ति से रचे ब्रम्हाण्डा , योग युक्ति थरपे नवखण्डा।

योग युक्ति तप तपे महेश , योग युक्ति धर धरे हैं शेष।
योग युक्ति विष्णु तन धारे , योग युक्ति असुरन दल मारे।

योग युक्ति गजानन जाने , आदि देव त्रिलोकी माने।
योग युक्ति करके बलवान , योग युक्ति करके बुद्धिमान।

योग युक्ति करा पावे राज , योग युक्ति कर सुधारे काज।
योग युक्ति योगेश्वर जाने , जनकादिक सनकादिक माने।

योग युक्ति मुक्ति का द्वार , योग युक्ति बिन नहीं निस्तारा।
योग युक्ति जाके मन भावे , ताकि महिमा कही न जावे।

जो नर पढ़े सिद्ध चालीसा , आदर करे देव तैंतीसा।
साधक पाठ पढ़े नित्य जो कोई , मनोकामना पूरण होई।

धुप दीप नैवेद्य मिठाई , रोट लंगोट भोग लगाई।

॥दोहा॥

रतन अमोलक जगत में , योग युक्ति है मीत।
नर से नारायण बने , अटल योगी की रीत।

योग विहंगम पंथ को , आदिनाथ शिव कीन्हा।
शिष्य प्रशिष्य परंपरा , सब मानव को दीन्हा।

प्रातःकाल स्नान कर , सिद्ध चालीसा ज्ञान।
पढ़े सुने नर पावही , उत्तम पड़ा निर्वाण।

इति चौरासी सिद्ध चालीसा संपूर्ण भया।
श्री नाथजी गुरूजी को आदेश ।आदेश।

गुरु गोरक्षनाथ भगवान की जय।
चौरासी सिद्धों की जय।

। इति श्री चौरासी सिद्ध चालीसा समाप्त ।

श्री (चौरासी) 84 सिद्ध चालीसा - Shri 84 Sidh Chalisa

श्री चौरासी सिद्ध चालीसा -Shree 84 Sidh Chalisa Video

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