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मधुबन के भौरें और गुबरैले की बोध कथा

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एक बार मधुबन के भौरें और गोबरउरे (गुबरैले- गोबर के कीड़े ) की भेंट हो गयी | उन दोनों की शक्ल एक दुसरे से काफी मिलती है | भौरे ने गुबरैले से कहा कि – मित्र बहुत दिन बाद मिले हो ,अभी तक कहाँ थे ? यह सुनकर गुबरैले ने कहा कि — मित्र मै तो अपने गोबर में ही जीवन का आनंद लेता हूँ | इस बात को सुनकर भौरे ने कहा कि – मित्र अगर बुरा न मानो तो मै तुम्हे अपने मधुबन कि सैर करना चाहता हूँ और दिखाना चाहता हूँ कि मधुबन में क्या आनंद है |

गुबरैले ने कहा कि मित्र मेरे भी मन में कई दिन से ये इच्छा थी कि तुम्हे अपने गोबर पे ले कर चलु तो आज अच्छा मौका मिला है | ऐसा सुनकर भौरें ने कहा कि – मित्र मेरी एक शर्त है कि मै तुम्हारे गोबर पे चलूँगा पर उससे पहले तुम्हे मेरे मधुबन में चलना होगा | बहुत आग्रह करने पर गोबरौरा मान गया और भौरे के साथ मधुबन कि तरफ चल दिया |

भौरें ने गुबरैले को मधुबन के एक फूल कि कली पर बिठा दिया और कहा कि तुम यहाँ बैठ के मधुबन का आनंद लो | हम लोग कुछ समय पश्चात फिर मिलते हैं | उसके बाद भौरा भी मधुबन के एक फूल पर बैठ कर उसकी खुसबू का आनंद लेने लगा |

थोड़े समय बाद उन दोनों कि मुलाक़ात हुई तब भौरें ने गुबरैले से कहा कि — कहो मित्र मधुबन में कितना आनंद मिला ? | तब गोबरउरे ने तपाक से उत्तर दिया कि मित्र मुझे तो जैसा अपने गोबर पे आनंद मिलता था वैसा ही आनंद यहाँ पाया हूँ ,मुझे कोई खास अंतर तो नहीं दिखाई पड़ा है |

भौरां आस्चर्य से पुछा कि — मित्र कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने उस गोबर को अपने साथ ले रखा हो ? इस पर गोबरउरे ने उत्तर दिया कि —- मित्र मै जब अपने घर ( गोबर ) से चला था तभी अपने मुह में गोबर कि लीद का टुकड़ा डाल लिया था ,ये सोच कर कि पता नहीं आगे मुझे गोबर मिले या न मिले |

तब भौरे ने कहा कि — मित्र जब तक तुम अपने मुह में से ये गोबर निकाल कर फेंक नहीं दोगे तब तक तुम्हे मधुबन का असली आनंद का पता भी नहीं चलेगा | ऐसा सुनकर गुबरैले ने गोबर कि गोली को मुह से फेंक दिया और दोनों फिर से एक बार मधुबन में जा कर फूल कि ताजी खिली कली पर बैठ गए और उसकी खुसबू में डूब गए और ऐसा डूबे कि शाम होते कली कि पंखुड़िया भी बंद हो गयी पर उन्हें होश नहीं रहा | सुबह में बाग़ का माली आया और उन कलियों को तोड़कर भगवान के चरणो में अर्पित कर दिया |

संत दरश को जाईये ,तजि ममता अभिमान |
ज्यों ज्यों पग आगे बढे ,कोटिक यज्ञ समान ||

—-पू गुरुपद बाबा
— श्री सर्वेश्वरी समूह संस्थान देवस्थानम् पड़ाव वाराणसी

लेख सौजन्य : अवधूत भगवान राम विश्व अघोर संगठन 

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धर्मो रक्षति रक्षितः