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असली माटी के गीत- चढ़ते फागुन जियरा जर गइले रे …

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पुराने भोजपुरी गानों की मधुरता

एक ज़माने में भोजपुरी गीतों का जादू हर उत्तर भारतीय के दिलों पे छाया हुआ था | ये वो दौर था जब गाने बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से लिखे जाते थे | उनमे भावनाएं और सुसंस्कार विद्यमान होते थे | सुन्दर लोकोक्तियाँ होती थी | गांव समाज के सरल ह्रदय लोगों का और प्रेम पे आधारित समाज व्यवस्था का भी बहुत बड़ा प्रभाव होता था | आज के भोजपुरी गाने सुनाने वाले शायद इन बातों पर विश्वास न करें |

लेकिन आज भी पुराने भोजपुरी गीतों में वो जादू है जो दिलो को चीरते हुए पार कर जाते है । पुराने भोजपुरी गीतों में दिल को छू लेने की तासीर है। इन गीतों में मट्टी की खुसबू है।ये रूह से निकलकर रूह को छूती हैं।

शायद कुछ लोग भाषा की मीन-मेख ले के बैठ जाएँ और “ये सच्ची भोजपुरी है, ये नहीं ” , जैसे तर्क करें । लेकिन इन बातों का कोई अर्थ नहीं । ये वो समय था जब भोजपूरी व अवधी का मिला साथ चार चाँद लगा देते थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का मैथिली मिश्रित भोजपुरी सब एक साथ मिल के जो जादू पैदा करते थे उसने भोजपुरी साहित्य को कई अनमोल कृतियां दी हैं । उस समय का सरल ह्रदय समाज कहीं इन गीतों के पीछे बहुत बड़ा प्रेरणा स्रोत जरूर रहा होगा ।

पुराने गीतों में सौम्य दुर्लभ शब्द भोजपुरी भाषा में चार-चाँद लगाते थे । ऐसे गीत अब कहाँ लिखे जा रहे हैं। बीत गया वह जमाना जब साफ-सुथरी अच्छी फिल्में बनती थीं और मर्मस्पर्शी गीत लिखे जाते थे। इन्हें संरक्षण कर प्रसारित करने की आवश्यकता है। निवेदन है उन भोजपुरी समाज से , आज के दौर के फूहड़ गानो से पुरानी गीतों को मिटने ना दे । अब आवश्यकता है की पुराने गीतों से प्रेरणा लेकर फिर से आगे जाया जाये |

दो शद्ब प्रस्तुत गीत के बारे में : चढ़ते फागुन जियरा जर गइले रे …

प्रस्तुत गीत स्वर्गीय मोहम्मद रफ़ी साहब द्वारा गाया गया एक निर्गुण गीत है । निर्गुण वो गीत होते थे जो उस दौर में संत , बैरागी परमात्मा को लक्ष्य करके गाते थे । जीव को बहुरिया मान कर और परमात्मा को प्रियतम मानकर , गीतकार अपने परमात्मा मिलान के भाव को व्यक्त करते थे । रोचक बात यह होती थी की साधारण लोग इसे अपने सामाजिक जीवन की स्थितियों से भी साम्य करके देख सकते हैं ।

निर्गुण गीतों का रास भोजपुरी में खूब मधुरता से उभरकर आता है | प्रस्तुत गीत में कलाकारों की निश्छल भाव और भंगिमा और चार चाँद लगाती है | गीत में उत्कृष्ट भाषा का प्रयोग किया गया है | कोई छल ना प्रपंच ; दिल के इतने करीब है ये भोजपुरी भाषा का संग |

गीत में ऐसा लगता है की कलाकारों को भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत न पड़ी हो। । यह कथन शायद अतिशयोक्ति भरा लगे लेकिन ऐसे गीत को सुनके बरबस ही कलाकारों के आँखों में भी सच के ही आंसू आ गए होंगे ।

कई सारी पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं | उस दौर की यादगारों से भरा मेरे जीवन का पल पल सुकून से भरी यादें मेरे जीवन के अनमोल खजाने हैं |

इस गीत को जब भी सुनता हूं और पूरे शरीर में कम्पन उत्पन्न हो जाता है और क्या कहे , ऐसे गाने सुनकर आत्मा का जैसे परमात्मा से मिलन हो जाता है। ये भोजपुरी का ही जादू है जो इतनी बड़ी बात को इतना आसान लगने लगता है प्यार मे भी गा सकते हैं और परम पिता परमात्मा के याद में भी| ये जादू एक दिन फिर लौटना चाहिए |

जितना खूब गाना है उतना ही खूब है रफ़ी साहब की अव्वाज़ , बेमिसाल गीत है , जवाब नहीं।ध्यान से सुने इस गाने को तो बरबस ही आखें भर जाती हैं। बहुत ही अच्छा गीत है।

एक एक अंतरे पर ध्यान दें :

..का… ओही देशवा कोईलिया ना बोले….. ???? महान कल्पना शीलता का जीता जागता उदाहरण.. जो आज के दौर के गीतकारों मे सर्वथा लुप्तप्राय है|

कोई इस गीत को परमात्मा की याद में सुनाता है तो कोई अपने प्रियतम की याद में |

… बलमा बिमल गईले  जा के विदेशवा — धरती अगिन लागे जरे असमनवा रतिया जहर  लागे डंक मारे दिनमा — कौने कसूरवा निठुर निरमोहिया असुआ आचारवा में भर गईले ……………

..चढ़ते फागुन जियरा जरि गई ले रे …. गीत ने तो मन मोह लिया ,

..अंसुवा आचारवा में भर गइले रे …..

धन्य है वो गायक वो कलाकार धन्य है वो लेखक धन्य है जो आज भी दिल के धड़कन को बढ़ा देती है|रफ़ी रफ़ी साहब के आवाज़ दिल के करीब है ।

अब ऐसा गाना कहाँ सुनने को मिलता है कोई गाये भी तो सुनाने वाले बदल गए हैं । लेकिन पुराने गीत आज भी जेहन में गूंज उठाते है । ये चीज नए गानों में कहाँ मिलती है । ऐसे गीत सुनने के मौज ही अलग है । ऐसे गीतों को संभाल कर रखने की जरुरत है | ये सब भोजपुरी गाने सुनने के बाद आजकल के रद्दी भोजपुरी गानों को सुनने की इच्छा नहीं होती है |

कई लोगों को शिकायत है की आज कल के गीतकारों और गायकों ने अवधी और भोजपुरी को बर्बाद कर दिया है। फूहड़ता सबसे पहले परोसी जाती है। । भोजपुरी साहित्य का गंभीर पतन हो गया है । जिन लोगो को यह शिकायत रहती है की भोजपुरी गाने गंदे होते है , उन्हें यह गीत सुनना चाहिए , उनकी राय बदल जाएगी । ।पुराने भोजपुरी गीतों में फूहड़ता नहीं , सरलता की मधुर फुहार भरी है । नए लेखकों से अनुरोध वो अपना आदर्श ऐसे संगीत को बनाएं |

Sweetness of Old Bhojpuri Songs:

This song is representative of the legendary classics of Bhojpuri richness. This Nirgun Immortal bhojpuri Holi folk song by Great Rafi . This is unforgettable music composition was created by Chitragupta. Song was written by Anjaan. Song shows the grief, pain of the lady who is alone in her village and the husband has gone way to a faraway place for earning a livelihood.

Falgun means the month of Holi and it is typically sung around the Holi festival.

The actors in this clip seem to need no extra persuasion from the director to emote. Just playing the song in the background in immortal Rafi sahab’s voice should have been enough for them to bring the sentimental tears.

This is classic old is Gold. This is very emotional which touches the heart. Timeless composition. The musical instrument SARANGI shown in the song , is not seen anymore nowadays.

Lyrics:

चढ़ते फगुन जियरा जर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे -२
चढ़ते फगुन जियरा जर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे -२

बलमा बिलमि गए जाके परदेसवा
कबहुँ न भेजे रामा कौनो संदेसवा
बलमा बिलमि गए जाके परदेसवा
कबहुँ न भेजे रामा कौनो संदेसवा
का होई देशवा कोइलिया न बोले
ईहो पपीहा सब मर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे
[चढ़ते फगुन जियरा जर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे -२ ]

धरती अगन लागी जरे आसमानवां
रतिया जहर लागे डंक मारे दिनवा
धरती अगन लागी जरे आसमानवां
रतिया जहर लागे डंक मारे दिनवा
कौने कसुरवा निठुर निर्मोहिया
हंसुआ आँचरवा में भर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे
[चढ़ते फगुन जियरा जर गईले रे
मोरा सजना सनेहिया बिसर गईले रे -२ ]



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