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भगवान श्री परशुराम चालीसा-2

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श्री परशुराम चालीसा-2:जय परशुराम बलवान दुनिया सार

॥दोहा॥

श्री शिव गुरु स्वामी माहेश्वर मज तु उद्धारी ।
उमा सहीत दायकु आर्शिवाद मज तु तारी ॥
बुद्धिदेवता तव जानिके दिये परशु तुमार ।
तव बल जानिये दुनिया सारी दुष्टि करे हहाकार ॥

॥चौपाई॥

जय परशुराम बलवान दुनिया सार। जय रामभद्र कहे लोक करे जागर॥१॥
शिव शिष्य भार्गव तव नामा । रेणुका पुत्र जमतग्निसुत लामा ॥२॥

शुरविर नारायण तव अंगी । छटा अवतार सुहीत के संगी ॥३॥
परशु तव हस्ता दिसे सुवेसा । ऋषि मुद्रिका तव मन श्रेसा ॥४॥


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हाथ शिवधनुष्य भार्गवा साजै । विप्र कुल कांधे जनेउ साजै ॥५॥
विष्णु अंश ब्रह्मकुलनंदन । तव गाथा पढे करे जग वंदन ॥६॥

वेद ही जानत असे चतुर । शिवजी के शिष्य बलशाली भगुर ॥७॥
पृथ्वि करे निक्षेत्र एक्कीस समया । विप्र रक्षोनी दुष्टास मारीया ॥८॥

भार्गव अवतारी तव गुन गावा । कर्म स्वरुपे तव चिरंजीवी पावा ॥९॥
सहस्राजुना तव तु संहारे । पिता वचन दिये तव तु पारे ॥१०॥

पीता होत तव अज्ञाये । माता शिरछेद कर तु जाये ॥११॥
जमदग्नी कहे मम पुत्र प्रियई । तुम जो चांहे आर्शिवाद मांगई ॥१२॥

भद्र कहते मम माता ही जगावैं । भ्राता सहीत मम सामोरी लावैं ॥१३॥
तव मुखमंडल दिसे ऋषिसा । घोर तपस्वि पठन संहीता ॥१४॥

मुद्रा गिने कुबेर ही थक जांते । तव धन कबि गिन ना पांते ॥१५॥
तुम उपकार ब्रह्मकुले कीह्ना । ब्रह्म मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो शक्ती सब जग जाना । राक्षस कांपे तुमये भय माना ॥१७॥
तुम चिरंजीव असे जग जानु । जो करे तव भक्ती मधुर फल भानु ॥१८॥

बुद्धिदाता परशु हथ तुज देई । शिव धनुष्य माहेश्वर मिलमेेई ॥१९॥
दुष्ट संहार कर त्रिलोक जिते । ब्रह्मकुल के तुम भाग्यविधाते ॥२०॥

ऋषि मुनि के तुम रखवारे । शिव आज्ञा होत दुहीत को संहवारे ॥२१॥
सब जग आंये तुह्मरी शरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

परशु चमक रवि ही छुंपै । भार्गव नाम सुनत दुष्ट थर कांपै ॥२३॥
रेणुका पुत्र नाम जब आंवै । तब तव गान सहस्र जुग गांवै ॥२४॥

परशुराम नाम सुरा । जपत रहो ब्रह्मविरा ॥२५॥
संकट पडे तो भद्र बचांवै । मन से ध्यान भार्गव जो लांवै ॥२६॥

जगत के तुम तपस्वी राजा । ब्रह्मकुल जन्मे उपकार मज वर कीजा ॥२७॥
इच्छा धरीत तुज भक्ती जो कीवै । इच्छित जो तिज फल पावै ॥२८॥

भार्गव नाम सुनित होय उजियारा । आज्ञा पालत तव जग दिवाकरा ॥२९॥
राम सह धनुर युद्ध पुकारे । अवतार सप्तम समज दुवारे ॥३०॥

युद्ध कौशल्य वेदो जानता । कौतुक देखे रेणुका माता ॥३१॥
चारो जुग तुज कीर्तीमासा । सदा रहो ब्रह्मकुल के रासा ॥३२॥

तेहतीस कोट देव तुज गुन गावै । भार्गव नाम लेत सब दुख बिसरावै ॥३३॥
तुज नाम महीमा लागे माई । जनम जनम करे पुण्य कमाई ॥३४॥

म्हारे चित्त तुज दुज ना जाई । सारे सेई सब सुख मज पाई ॥३५॥
परशुराम नाम सुने भागे पीरा । भद्र नाम सुनत उठे ब्रह्मविरा ॥३६॥

जय परशुराम कहें मज विप्राईं । तुज कृपा करहु भार्गव नाईं ॥३७॥
पठे जो यह शत बार कोई । भार्गव कृपा उस सदैव होई ॥३८॥

पढित यह परशुराम चालीसा । सुख शांती नांदे रहे विष्णुदासा ॥३९॥
वसंतसुत पुरुषोत्तम रज असै तैरा। तुज भक्ती मोही जुग जग सारा ॥४०॥

॥दोहा॥

रेणुका नंदन नारायण अंश ब्रह्मकुल रुप ।
परशुराम भार्गव रामभद्र ह्रदयी बसये भुप ॥

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